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शनिवार, 1 जनवरी 2011

विनायक सेन - लामबंद हुए जन संगठनों ने कहा -छत्तीसगढ़ का काला कानून रद्द हो


अंबरीश कुमार
लखनऊ, 28 दिसंबर। मानवाधिकार नेता विनायक सेन को देशद्रोह के आरोप में जेल भेजे जाने के खिलाफ उत्तर प्रदेश में माहौल गरमा गया है । आज कई जगह जुलूस निकाला गया और नारा लगा -देखो कारपोरेट पूंजी का खेल , देशभक्त डाक्टर को जेल । प्रदेश में ३१ दिसंबर से पांच जनवरी तक विनायक सेन के मुद्दे पर कई शहरों में प्रदर्शन का एलान किया गया है । राजधानी लखनऊ में साहित्यकारों और संस्कृतकर्मियों ने जनसभा कर विरोध दर्ज कराया साथ ही दो जनवरी को शहीद स्मारक पर बड़े धरने का एलान किया । आजमगढ़ में आज फिर इस मुद्दे को लेकर प्रदर्शन हुआ तो बरेली से काशी तक छात्र ,शिक्षक , रंगकर्मी और मानवाधिकार संगठन लामबंद होते नजर आ रहे है । काशी से इलाहाबाद में जहाँ फिर मौन जुलूस की तैयारी है वहां बरेली में सड़क पर उतर कर विरोध जताने का एलान किया गया है । इस बीच जन संघर्ष मोर्चा ने इस मुद्दे पर पुरजोर विरोध का एलान किया है । ज्यादातर जन संगठनों ने छत्तीसगढ़ सरकार का कला कानून रद्द करने की मांग की है ।
प्रदेश में विनायक सेन की सजा और छत्तीसगढ़ विशेष लोक सुरक्षा कानून को रद्द करने की मांग को लेकर धरने प्रदर्शनों का दौर जारी रहा। आजमगढ़ जिला मुख्यालय पर सामाजिक व राजनैतिक संगठनों ने सैकड़ों की संख्या में अंबेडकर प्रतिमा के सामने विनायक सेन के रिहाई के लिए प्रर्दशन किया तो वहीं वाराणसी में आइसा ने बीएचयू गेट से रविदास पार्क तक विरोध मार्च निकाला। विरोध प्रदर्शनों के इस दौर में लखनउ में 31 दिसंबर को शहीद स्मारक पर बुद्धिजीवी और सामाजिक संगठन प्रदर्शन करेंगे तो वहीं जनसंस्कृति चार जनवरी को अपना प्रतिरोध दर्ज करेगा। सामाजिक कार्यकर्ता अरुन्धती ध्रुव ने बताया कि लोकतंत्र पसंद मानवाधिकार कार्यकर्ता विनायक सेन ने मानवाधिकार आंदोलन को व्यापक आवाज दी है, उनको देशद्रोह और आजीवन कारावास की सजा देने के खिलाफ लखनऊ के बुद्धिजीवी और सामाजिक संगठन 31 दिसंबर को शहीद स्मारक पर धरना देंगे। गौरतलब है कि विनायक सेन जो पेशे से चिकित्सक हैं और गरीब आदिवासीयों की चिकित्सा का उनका अभियान अन्तर्राष्ट्ीय स्तर पर प्रशसंनीय और चर्चित है। इसके लिए उन्हें अनेकों अन्तराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए हैं।इस बीच आज
आजमगढ़ जिला मुख्यालय पर अम्बेडकर प्रतिमा के सामने प्रदर्शन कर रहे लोगों ने नारे लिखी तख्तियां लहराते हुए नारे लगाए कि विनायक सेन को उम्र कैद-लोकतंत्र को सजाए मौत, न्यायपालिका का राजनीतिक इस्तेमाल बंद करो, हमारे पास भी कम्युनिस्ट साहित्य है हमें भी गिरफ्तार करो, यूएपीए और छत्तीसगढ़ जन सुरक्षा अधिनियम को तत्काल रद्द करों । सामाजिक संगठन कारवां के विनोद यादव और अधिवक्ता अब्दुल्ला ने कहा कि मजबूत मानवाधिकार संगठन ही सच्चे लोकतंत्र की गारंटी करवाता है। पीयूसीएल देश का सर्वाधिक सम्मानित मानवाधिकार संगठन है। डा विनायक सेन को सजा देकर न्यायालय ने उन तमाम जनतांत्रिक आवाजों को चेतावनी दी है जो रोजी-रोटी, भूख विस्थापन के सवाल पर लड़ते हैं। विनायक सेन पर देशद्रोह का आरोप लोकतंत्र की अवमानना है। विनायक सेन जनता के लिए, जनता द्वारा स्थापित लोकतंत्र के सच्चे सिपाही हैं। हम मांग करते हैं कि केंद्र और राज्य सरकार विनायक सेन के खिलाफ लगाए गए जनविरोधी राजनीति से प्रेरित आरोंपों व जनविरोधी छत्तीसगढ़ लोक सुरक्षा कानून को तत्काल रद्द करे और विनायक सेन को रिहा करे। धरने में निर्णय लिया गया कि राष्ट्रपति, मुख्य न्यायाधीश एवं छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री को लाखों की संख्या मे पोस्ट कार्ड भेज कर हम आजमगढ के लोकतंत्र पसंद नागरिक इस निर्णय पर विरोध दर्ज कराएंगे, ताकि भविष्य मे इस तरह के जनविरोधी निर्णय न हो सके। इस धरने में शेख रजब अली वेलफेयर सोसाइटी, कारवां, निदा, पीयूसीएल, जेयूसीएस और संजरपुर संघर्ष समिति आदि सामाजिक व मानवाधिकार संगठनों ने आयोजित किया।
आइसा के प्रदेश अध्यक्ष सरिता पटेल ने बताया कि हम लोगों ने विनायक सेन को रिहा करने की मांग को लेकर बीएचयू गेट से रविदास पार्क तक जुलूस निकाला। जुलूस के दौरान आइसा कार्यकर्ताओं ने कारपोरेट पूंजी का खेल- देश भक्त डाक्टर को जेल- नहीं चलेगा, डा विनायक सेन की अनयायपूर्ण सजा को रद्द करो, जल-जंगल-जमीन की लूट बंद करो, लोकतांत्रिक आंदोलनों का दमन नहीं सहेंगे के नारे लगाए। तो वहीं आइसा के प्रदेश उपाध्यक्ष सुनील मौर्या ने बताया कि राजनैतिक दबाव में विनायक सेन को देशद्रोही कहे जाने के खिलाफ हम पांच दिसंबर को इलाहाबाद विश्वविद्यालय में नागरिक सम्मेलन करेंगे। इस सम्मेलन के माध्यम से हम लोकतंत्र पर बढ़ते हमले और न्यायपालिका की भूमिका और अयोध्या फैसला और विनायक सेन को दी गई सजा को लेकर व्यापक स्तर पर सवाल उठाएंगे।
इस बीच जन संस्कृति मंच की तरफ से लखनऊ में आयोजित सभा में लेखकों, संस्कृतिकर्मियों, सामाजिक व राजनीतिक कार्यकताओं ने विनायक सेन पर देशद्रोह का आरोप लगाते हुए उन्हें दी गई उम्रकैद की सजा पर अपना पुरजोर विरोध प्रकट किया है। यह सभा अमीनाबाद इंटर कॉलेज में हुई जिसमें इससे सम्बन्धित प्रस्ताव पारित किया गया । जिसमें कहा गया कि लोकतंत्र के सभी स्तम्भ आज पूँजी के मठ व गढ़ में बदल गये हैं जहाँ से जनता, उसके अधिकारों व लोकतान्त्रिक मूल्यों पर गोलाबारी की जा रही है। इसने न्ययापालिका के चरित्र का पर्दाफाश कर दिया है। डॉ विनायक सेन पर देशद्रोह का आरोप लगाने व उन्हें उम्रकैद की सजा देने का एक मात्र उद्देश्य जनता के प्रतिरोध की आवाज को कुचल देना है तथा सरकार का विरोध करने वालों को यह संदेश देना है कि वे सावधान हो जाए और सजा के लिए कोई संकट पैदा न करें। इस घटना पर विरोध प्रकट करने वालों में लेखक अनिल सिन्हा, शकील सिद्दीकी, डॉ गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव, कवि भगवान स्वरूप कटियार, कौशल किशोर, ब्रह्मनारायण गौड, श्याम अंकुरम़ व वीरेन्द्र सारंग, कवयित्री व पत्रकार प्रतिभा कटियार, कथाकार सुरेश पंजम व सुभाष चन्द्र कुशवाहा, नाटककार राजेश कुमार, ‘अलग दुनिया’ के के के वत्स, पूनम सिंह, एपवा की विमला किशोर, कलाकार मंजु प्रसाद, गंगा प्रसाद, सामाजिक कार्यकर्ता अरुण खोटे, इंकलाबी नौजवान सभा के प्रादेशिक महामंत्री बालमुकुन्द धूरिया, भाकपा ;मालेद्ध के शिवकुमार, लक्षमी नारायण एडवोकेट, ट्रेड यूनियन नेता के के शुक्ला, डॉ मलखान सिंह, जानकी प्रसाद गौड़ प्रमुख थे।
प्रस्ताव में माँग की गई है कि डॉ सेन को आरोप मुक्त कर उन्हें रिहा किया जाय। प्रस्ताव में आगे कहा गया है कि जिस छतीसगढ़ विशेष लोक सुरक्षा कानून 2005 और गैरकानूनी गतिविधि ;निरोधकद्ध कानून 1967 के अन्तर्गत डॉ विनायक सेन को आजीवन कारावास की सजा दी गई है, ये कानून अपने चरित्र में दमनकारी हैं और ऐसे जनविरोधी कानून का इस्तेमाल यही दिखाता है कि देश में अघोषित इमरजेंसी जैसी स्थिति है। जब भ्रष्टाचारी, अपराधी, माफिया व धनपशु सम्मान पा रहे हों, वहाँ आदिवासियों, जनजातियों को स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराना, जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए संघर्ष करना तथा सलवा जुडुम से लेकर सरकार के जनविरोधी कार्यों का विरोध करने वाले डॉ सेन पर दमनकारी कानून का सहारा लेकर आजीवन कारावास की सजा देने से यही बात सिद्ध होती है। प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि सरकार की तरफ से देशभक्ति का नया मानक गढ़ा जा रहा है जिसके जरिए सच्चाई और तथ्यों का गला घोंटा जा रहा है। इस मानक में यदि आप फिट नहीं हैं तो आपको देशद्रोही घोषित किया जा सकता है और आपके विरूद्ध कार्रवाई की जा सकती है, आप गिरतार किए जा सकते हैं आपको सजा दी जा सकती है और आप देश छोड़ने तक के लिए बाध्य किये जा सकते हैं। यही अरुंधती राय के साथ किया गया। उनके ऊपर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर दिया गया है और डॉ विनायक सेन को देशद्रोही करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है।
अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा की केंद्रीय कार्यकारिणी ने रायपुर ट्रायल कोर्ट की तरफ से डा विनायक सेन को देशद्रोह के आरोप में दोषी पाकर उन्हे उम्रकैद की सजा दिए जाने की कड़ी निंदा की और कहा कि यह आदेश प्रेरित है और जनविरोधी है। एआईकेएमएस ने मांग की है कि गैरकानूनी गतिविधि (निरोधक) कानून और छत्तीसगढ़ जन सुरक्षा अधिनियम को तुरन्त रद्द किया जाए और सेन को बिना शर्त रिहा किया जाए ।

मजदुर सभा ने आगे कहा कि अभियोजन पक्ष के पास विनायक सेन के विरूद्ध कोई केस ही नहीं था। वास्तव में सेन मानवतावाद से प्रेरित एक गरीब के प्रति जनपक्षधर चिकित्सक रहे हैं । यही उनके उत्पीडन की मुख्य वजह भी है है। उनपर झूठे आरोप लगाए गए और ट्रायल कोर्ट ने आरोपों पर अपनी मोहर लगाते हुए उन्हें माओवादी समर्थक और उनका कूरियर घोषित कर दिया। अतिवादी यूएपीए और छत्तीसगढ़ जन सुरक्षा कानून जजों को यह अधिकार देते है कि वो ठोस साक्ष्य की आवश्यकता को ताक पर रखकर पुलिस के बयानों के आधार पर सजा दे दें ।जनसत्ता
जनादेश से साभार
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