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सोमवार, 3 अप्रैल 2017

सेक्यूलरिज्म का बोझा अकेले मुसलमान क्यों ढोए, कथित सामाजिक न्याय के जातिगत जनाधारों को अपने अधिकारों की बात करने वाला यह ‘नया मुसलमान’ हजम नहीं हो रहा

                                                                                                       शाहनवाज आलम
उत्तर प्रदेश चुनाव में भाजपा की लगभग एकतरफा जीत और योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद मुसलमानों पर दो नजरियों से बात हो रही है। पहला नजरिया हिंदुत्ववादी है, जिसकी अभिव्यक्ति आप वास्तविक और वर्चुअल दुनिया में मुसलमानों के खिलाफ मुखर होती हिंसक आवाजों में देख सकते हैं। तो वहीं दूसरा नजरिया इस परिणाम के बाद मुसलमानों के लोकतांत्रिक इदारों में बिल्कुल हाशिए पर पहुंच जाने से चिंतित है। जो उसके मुताबिक लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है।
इस तरह इन दोनों विश्लेषणों में मुसलमानों की निरीहिता ही केंद्रीय बिंदु है। लेकिन चूंकि ये दोनों ही विश्लेषण बाहरी नजरिए पर आधारित हैं इसलिए इनमें सच्चाई पूरी तरह नुमायां नहीं है। इसके उलट, उनके अंदर ऐसा बहुत कुछ नया और उत्साहवर्धक घट रह है जिनसे उनमें नई उम्मीदें पैदा होती हैं।
दरअसल मुसलमानों के लिए यह जनादेश बदलते सामाजिक समीकरणों के लिहाज से बिल्कुल ही आश्चर्य में डालने वाला नहीं है। क्योंकि उसे 2014 के लोकसभा चुनाव से काफी पहले से सपा और बसपा के कथित हिंदू सेक्यूलर मतदाताओं के अंदर चल रहे मुस्लिम विरोधी गोलबंदी का अंदाजा था।
मसलन, 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले हुए मुजफ्फरनगर साम्प्रदायिक हिंसा में उसे सपा और बसपा के मूल जनाधारों में उस हिंसा को जायज ठहराने या उसे स्वाभाविक हिंदू प्रतिक्रिया के बतौर देखने या फैजाबाद में यादवों द्वारा मुसलमानों के खिलाफ दशहरा के दिन किए गए हमलों से अंदाजा हो गया था कि आने वाले चुनावों में यह तबका भाजपा के साथ जा सकता है। हालांकि इन जातियों में यह कोई नया रूझान नहीं था, पहले भी ऐसा होता रहा है। लेकिन तब मुसलमान खुलकर सपा और बसपा के जनाधारों के खिलाफ शिकायती मुद्रा में नहीं होता था। उसकी कोशिश होती थी कि वह इन सवालों पर चुप रह कर उन्हें भाजपा के पक्ष में जाने से रोके या उन्हें न्यूट्रल बनाए रखने के लिए खामोश रहे।
लेकिन अगर हम पिछले 10 सालों के मुस्लिम समाज के अंदरूनी जिंदगी में झांकें तो हम पाएंगे कि 2007 से ही बसपा सरकार में आतंकवाद के नाम पर मुसलमानों की धड़पकड़ से उसके अंदर अपने साथ होने वाली नाइंसाफियों पर किसी रणनीतिक कारण से प्रतिक्रिया नहीं देने और चुप रह जाने की प्रवृत्ति में बदलाव आना शुरू हो गया था। इस बदलाव का केंद्रीय विचार अपने साथ होने वाली नाइंसाफी के अलावा इंसाफ के लिए दूसरों का मुंह ताकने के बजाए खुद आवाज उठाना भी था।
यह कोई सामान्य बदलाव नहीं था। बल्कि 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद मुलायम सिंह और मायावती जैसे नेताओं द्वारा उनके अंदर बैठा दी गई इस धारणा को तोड़ने की कोशिश इसमें निहित थी कि इन पार्टियों की निगहबानी में वो सुरक्षित हैं और उन्हें खुद राजनीति में आने की कोई जरूरत नहीं है।
यहां यह भी गौरतलब है कि इस नसीहत को मानकर लगभग पूरी तरह गैरसियासी हो चुकी एक पीढ़ी जिसने मुलायम सिंह यादव को ‘मौलाना’ की उपमा दी थी, अब नई पीढ़ी को सपा-बसपा के साथ खड़े रहने का कोई मजबूत तर्क नहीं दे पा रही थी।
यह नई पीढ़ी कथित सामाजिक न्याय में अपने प्रतिनिधित्व पर सवाल उठा रही थी और यह भी पूछ रही थी कि सेक्यूलरिज्म का बोझा वही अकेले क्यों ढोए। इस तरह उसमें एक नया सियासी वर्ग निर्मित हुआ है जो ‘रिस्क’ लेना सीख रहा है।
इस तरह यह ‘नया मुसलमान’ धर्मनिपेक्षता की नई और बड़ी लकीर खींचने की प्रक्रिया में था और कथित सेक्यूलर राजनीति के पुराने मानकों- मदरसों को वित्तिय सहायता, हज सब्सिडी या उर्दू अनुवादकों की भर्ती, को खारिज कर अपनी शर्तों को मजबूती से रख रहा था। जिसको नजरअंदाज करना आसान नहीं था। मसलन, मायावती ने आतंकवाद के नाम पर गिरफ्तार दिखाए जा रहे दो युवकों के सवाल पर मुसलमानों के आंदोलन के दबाव में जस्टिस निमेष जांच आयोग का गठन किया। ऐसा देश में पहली बार हुआ था। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद पहली बार मुसलमान किसी राजनीतिक मुद्दे पर और वो भी एक कथित सेक्यूलर पार्टी के खिलाफ आंदोलन कर रहा था। इस बदलाव को सपा ने भी भांपा और इस ‘नए मुसलमान’ मतदाता वर्ग को रिझाने के लिए उसने आतंकवाद के नाम पर फंसाए गए मुस्लिम युवकों को रिहा करने, बरी हुए युवकों का पुनर्वास और मुआवजा देने, मुसलमानों में आत्मविश्वास जगाने के लिए राज्य की सुरक्षा बलों में भर्ती के बाबत मुस्लिम बहुत इलाकों में विशेष भर्ती कैम्प लगाने जैसे चुनावी वादे किए।
कहने की जरूरत नहीं कि इनमें से एक भी वादा उसने पूरा नहीं किया, लेकिन मुसलमानों के लिए यह कोई कम बड़ी उपलब्धि नहीं थी। इससे पहले किसी भी राज्य में मुसलमानों के वोट पर राजनीति करने वाली किसी पार्टी को ऐसे वादे करने पर वह कभी मजबूर नहीं कर पाया था।
वहीं दूसरी ओर इस ‘नए मुसलमान’ के उदय से परम्परागत ‘सेक्यूलर’ राजनीति के अपने मूल जातिगत जनाधार में भी इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप बदलाव आने शुरू हो चुके थे। चूंकि सपा और बसपा ने अपने जातिगत आधारों को मुसलमानों से वोट और नोट लेना तो सिखा दिया था, उनके सवालों पर उन्हें संवेदनशील बनाने या उनके धर्मरिरपेक्षीकरण की कोई प्रक्रिया नहीं चलाई थी। इसलिए मुसलमानों को निरीहता की स्थिति में देखने की उसे आदत हो गई थी। उसे निरीह मुसलमान ही अच्छे लगते थे।
कथित सामाजिक न्याय के जातिगत जनाधारों को अपने अधिकारों की बात करने वाला यह ‘नया मुसलमान’ हजम नहीं हो रहा था। लिहाजा, यही वह समय था जब संघ परिवार और भाजपा के साथ उसका गुप्त चुनावी समझौता हुआ। ‘गुप्त’ इसलिए कि उसने 2014 के लोकसभा चुनाव में मुसलमानों को इसकी भनक नहीं लगने दी। वहीं इस ‘नए मुसलमान’ ने इन 10 सालों में सपा और बसपा के साम्प्रदायिक रवैये के चलते भविष्य की योजनाओं के तहत अपनी सामाजिक और राजनीतिक लीडरशिप खड़ी करने का इरादा भी बनाना शुरू कर दिया था। जिसके तहत सामाजिक तौर पर रिहाई मंच, सियासी तौर पर उलेमा काउंसिल, पीस पार्टी खड़ी हुई जिसमें पहले से चली आ रही नेलोपा की लीडरशिप की अक्सरियत थी। वहीं बाद में ओवैसी की एमआईएम भी आई।
यहां यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा कि जहां पहले ऐसी किसी भी पार्टी को मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा सपा-बसपा के प्रभाव में भाजपा का एजेंट कह कर खारिज कर देता था, वहीं इस दरम्यान हुए चुनावों में उसने भले इन्हें जीतने लायक वोट न दिया हो लेकिन ऐसे किसी भी तर्क को एक सिरे से नकार दिया। यहां तक कि इस बार भाजपा की प्रचंड जीत के बावजूद मुसलमानों में अपने वोटों के बंट जाने का अपराधबोध बिल्कुल गायब है, जैसा कि ऐसी स्थितियों में पहले होता रहा है। उल्टे इस बार वो सपा और बसपा के हिंदू जनाधार के बंटवारे को भाजपा की जीत का जिम्मेदार मान रहा है। राजनीतिक तौर पर जड़ और नई बहसों और प्रयोगों से बचने वाले इस समाज में आया यह एक अहम बदलाव है।
वहीं अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो रहे इस ‘नए मुसलमान’ को सत्तारूढ़ सपा ने कैसे सम्बोधित किया यह समझना कथित सेक्यूलर राजनीति के हिंदुत्ववादी चरित्र को समझने के लिए अहम होगा। सपा ने अपने घोषणापत्र से इन सभी मुद्दों को ही गायब कर दिया। इस तरह उसने अपने हिंदू जातिगत जनाधार को यह संदेश देने की कोषिष की कि वो उसे मुस्लिम हितैषी समझने की गलती ना करे, उस पर भरोसा करे वो अपनी गलती सुधारने को तैयार है। वहीं दूसरी ओर इससे उसने मुसलमानों में विकसित हो रही राजनीतिक चेतना को ही पलट देने की कोषिष की।
जाहिर है, अखिलेश यादव ने ऐसा इसलिए किया कि यह चेतना उनकी सेक्यूलरिज्म की जड़ और यथास्थितिवादी राजनीति को चुनौती दे रही थी। यह ज्यादा सवाल पूछने वाला ‘नया मुसलमान’ ज्यादा प्याज खाने वालों से खतरनाक था।
वहीं इस ‘नए मुसलमान’ में एक और सुखद बदलाव यह दिखा कि उसने मुजफ्फरनगर हिंसा के जिम्मेदार जाटों को बिल्कुल ही वोट नहीं दिया। जबकि अजित सिंह को यह उम्मीद थी कि मुसलमान फिर से जाटों को वोट दे देंगे। यह निर्णय सुखद इसलिए है कि कम से कम मुसलमान एक सामान्य मानवीय प्रवृत्ति का प्रदर्शन कर पाया जिसके तहत कोई इंसान अपने हत्यारों या जालिम के साथ नहीं खड़ा होता। यानी सामने वाले के अपनी सुविधानुसार सेक्यूलर और कम्यूनल होने के परम्परागत एकाधिकार को मुसलमानों ने खारिज कर दिया।
यानी उसने भाजपा को रोकने के नाम पर अपनी मानवीय गरिमा से समझौता नहीं किया। अपनी गरिमा और स्वायत्ता को हर हाल में बचाए रखने की जिद ही लोकतंत्र में नई सम्भावनाओं को जन्म देती है। 2017 का मुसलमान, इन सम्भावनाओं से भरपूर है जो भविष्य की किसी भी सेक्यूलर राजनीति को अब वास्तव में पहले से ज्यादा सेक्यूलर होने पर मजबूर करेगा। मुसलमानों के लिए यह कोई मामूली उपलब्धि नहीं है।
 (स्वतंत्र लेखक, डाॅक्यूमेंट्री फिल्मकार, और राजनीतिक कार्यकर्ता)
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शनिवार, 1 अप्रैल 2017

ये उस भारत की हार है जो गांधी को नहीं मारता

                                                                                       
                                                शाहनवाज आलम
भारत जैसे किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी राजनीतिज्ञ का ‘फायर ब्रांड’ जैसी उपमा से सम्बोधित किया जाना जितना सामान्य नजरिए से स्वीकृत किया जाता है वह उतना ही एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के बतौर हमारी असामान्य कमजोरी को जाहिर करता है। मसलन, जब हम योगी आदित्यनाथ या उन जैसे राजनीतिज्ञ को ‘फायर ब्रांड’ मान लेते हैं तो इससे यही जाहिर होता है कि हमारी न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्था उनके संविधान विरोधी भाषणों को या तो नजरअंदाज करके उनके हौसले को बढ़ाती है या वे ऐसी किसी गतिविधि को अंजाम देकर भी बहुत आसानी से कानून के शिंकजे से बच जाने की महारत  रखते हैं। इसलिए किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में ‘फायर ब्रांड’ नेता का उत्पन्न होना उसकी अपनी व्यक्तिगत उपलब्धि से कहीं ज्यादा तंत्र की स्वैच्छिक विकलांगता को दर्शाता है। वहीं ऐसे किसी भी राजनीतिज्ञ का लोकप्रिय होना और लगातार चुनाव जीतना यह भी साबित करता है कि हमारा निर्णायक बहुमत संविधान विरोधियों से कितना प्रेम करता है। इसीलिए एक डाक्यूमेंट्री फिल्मकार के बतौर जिसने योगी आदित्यनाथ को लम्बे समय तक फाॅलो किया है और उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाहियों का हिस्सा रहा है, मेरे लिए ‘फायर ब्रांड’ योगी आदित्यनाथ का मुख्यमंत्री बन जाना, भाजपा और संघ की उपलब्धि से कहीं ज्यादा उनको संरक्षण देने वाले विपक्षी दलों और उन्हें ‘वाॅक ओवर’ देने वाली न्यायपालिका की उपलब्धि है।
मसलन, मेरी फिल्म ‘सेेफ्ररन वाॅर ए वाॅर अगेंस्ट नेशन’ में शामिल योगी आदित्यनाथ के आजमगढ़ में 2008 में दिए गए भाषण जिसमें वो एक के बदले 10 लोगों की हत्या का आह्वान कर रहे हैं, का एक हिस्सा तीन दिनों के अंदर 3 लाख लोगों ने देखा है। उनका यह भाषण पहले भी मीडिया में बहस का विषय बनता रहा है। लेकिन यह जानना हमारे तंत्र की स्वैच्छिक विकलांगता को साबित करने के लिए क्या काफी नहीं होगा कि फिल्म के निर्माताओं शाहनवाज आलम, राजीव यादव और लक्ष्मण प्रसाद द्वारा जब 20 मार्च 2009 को मुख्य चुनाव आयुक्त, भारत निर्वाचन आयोग व 23 मार्च 2009 को मुख्य निर्वाचन अधिकारी उत्तर प्रदेश को भाषण की मूल रिकार्डिंग की सीडी समेत प्रार्थना पत्र प्रेषित कर उनसे आदित्यनाथ व रमाकांत यादव के विरुद्ध धारा 125 रिप्रेजेन्टेशन आॅफ पिपुल्स एक्ट 1951 एवं अन्य विधिक प्राविधानों के अन्तर्गत एफआईआर दर्ज कराने की मांग की गई तो दूसरी तरफ सेे कोई रिस्पांस ही नहीं मिला। जिसके बाद हम लोगों ने मामले को इलाहाबाद हाई कोर्ट के समक्ष रखा। तब योगी आदित्यनाथ जिस वीडियो को कई अवसरों पर अपना मान चुके हैं, उस पर तत्कालीन अपर पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण) आजमगढ ने 16 अपै्रल 2009 को अपना पक्ष रखते हुए ऐसे किसी आपत्तिजनक भाषण के दिए जाने से ही इंकार कर दिया। इतना ही नहीं उल्टे उन्होंने भाषण के सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ने एवं आपराधिक श्रेणी में न आने व आवेदकों द्वारा बढ़ा-चढ़ाकर मनगढ़ंत साक्ष्य तैयार किए जाने की बात कहते हुए आवेदन पत्र को झूठा व निराधार बता दिया। वहीं यह भी जानना महत्वपूर्ण होगा कि इसी भाषण में योगी आदित्यनाथ ने हाईकोर्ट के हवाले से इस झूठे तथ्य को भी प्रसारित किया था कि उसने अपने एक फैसले में राज्य सरकर से यह पूछा है कि हिंदू लड़कियां ही मुस्लिम लकड़ों के साथ क्यों भागती हैं। इस तरह उन्हांेने हाईकोर्ट के झूठे उद्धरण के जरिए मुसलमान महिलाओं के साथ यौनिक हिंसा को जायज ठहराने का प्रयास किया। लेकिन, अदालत ने इस भाषण की सीडी और उनके भाषण के ट्रांस्कृप्ट मुहैया कराने के बावजूद इस पर किसी तरह की कोई कार्रवाई नहीं की। जब की यह खुद न्यायपालिका के अपमान का मजबूत उदाहरण था।
यानी उनकेे जिस भाषण पर लोग उनकी आलोचना कर रहे हैं या जिसे वे खुद वाजिब ठहरा चुके हैं उस भाषण के अस्त्तिव को ही प्रशासन नकार चुका है। यहां यह याद रखना जरूरी होगा कि ऐसे अपराध में  3 साल से लेकर उम्र कैद तक की सजा का प्रावधान है।
जाहिर है किसी के ‘फायर ब्रांड’ नेता बनने में उसकी वाकपटुता या विभाजक शब्दों और मुहावरों के उसके चुनाव की क्षमता से कहीं ज्यादा श्रेय ऐसी भाषा पर अंकुश लगाने के लिए जिम्मेदार तंत्र की आपराधिक भूमिका को जाता है।
इसी तरह, अगर हम उनके खिलाफ दायर मुकदमों की नवईयत को देखें तो ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे। मसलन, 27 जनवरी 2007 की रात गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर योगी आदित्यनाथ ने विधायक राधामोहन दास अग्रवाल और गोरखपुर की मेयर अंजू चैधरी की मौजूदगी में हिंसा फैलाने वाला भाषण देते हुए ऐलान किया कि वो ताजिया नहीं उठने देंगे और खून की होली खेलेंगे। जिसके लिए उन्होंने आस-पास के जिलों में भी अपने लोगों को कह दिया है। इस भाषण के बाद भीड़ ‘कटुए काटे जाएंगे, राम राम चिल्लाएंगे’ के नारों के साथ मुसलमानों की दुकानंे फंूकती आगे बढ़ती चली गई। इसके बाद गोरखपुर, देवरिया, पडरौना, महाराजगंज, बस्ती, संत कबीरनगर और सिद्धार्थनगर में योगी के कहे अनुसार ही मुस्लिम विरोधी हिंसा हुई। लेकिन इस पूरे प्रकरण जिसमें मुसलमानों की करोड़ों की सम्पत्ति का नुकसान हुआ उसमें मायावती सरकार में पुलिस अधीक्षक से एफआईआर दर्ज करने का प्रार्थना पत्र बेमानी साबित हुआ। जिसके बाद सामाजिक कार्यकर्ताओं परवेज परवाज और असद हयात द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट में रिट पेटिशन दायर कर प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की गई लेकिन अदालत ने उसे खारिज करते हुए सेक्षन 156 (3) के तहत कार्रवाई का निर्देश दिया। जिसके बाद सीजेएम गोरखपुर की कोर्ट में एफआईआर दर्ज कराने के लिए गुहार लगाई गई। जिस पर कुल 10 महीने तक सुनवाई चली और अंततः मांग को खारिज कर दिया गया। जिसके खिलाफ फिर हाईकोर्ट में रिवीजन दाखिल हुआ। तब जाकर इस मामले में एफआईआर दर्ज हो पायी। यहां यह जानना रोचक होगा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने अपनी आत्मकथा ‘मेरे बहुजन संघर्ष का सफरनामा’ के भाग 1 में लिखा है कि उन्होंने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को पत्र लिख कर कहा था कि योगी आदित्यनाथ की गतिविधियां राष्ट्रविरोधी हैं जिस पर रोक लगनी चाहिए। जाहिर है मायावती अपनी आत्मकथा में तो यह लिख सकती थीं लेकिन उनके राज में योगी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के लिए किसी को भी कम से कम दो बार हाईकोर्ट जाना पड़ता था।
वहीं इस एफआईआर के दर्ज होने के बाद योगी के साथ सहअभियुक्त अंजू चैधरी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर एफआईआर और जांच पर स्टे ले लिया। जिसके बाद 13 दिसम्बर 2012 को सुप्रीम कोर्ट ने अंजू चैधरी की एसएलपी को खारिज कर दिया और जांच के आदेश दे दिए। लेकिन सीबीसीआईडी की इस जांच के लिए अखिलेश यादव सरकार ने अपने जांच अधिकारी को अनुमति ही नहीं दी और मामला वहीं का वहीं पड़ा रहा। यहां 2007 में पडरौना शहर और रजानगर में हुई मुस्लिम विरोधी हिंसा का उदाहरण भी देखा जाना चाहिए जिसमें मुसलमान दुकानदारों की गुमटियों को न सिर्फ पूरी तरह जला दिया गया बल्कि उनकी जगह रातों रात हिंदू दुकानदारों को बैठा दिया गया और इसे तत्कालीन मुलायम सिंह सरकार ने साम्प्रदायिक हिंसा तक मानने से इंकार कर दिया। जाहिर है, योगी आदित्यनाथ को बसपा और सपा दोनों ही सरकारों ने संरक्षित किया।
दरअसल, योगी कोई अचानक प्रकट हुए राजनीतिज्ञ नहीं हैं जैसा कि मीडिया और लिबरल बुद्धिजीवी तबका समझ रहा है। वह अपने आप में एक पूरा तंत्र हैं जो लम्बे समय से काम कर रहे है और जिनके पास अपनी सेना, न्यायतंत्र, मीडिया और अपना प्रषासनिक अमला है, या उनके लोग इन अमलों में शामिल हैं। जो सिर्फ और सिर्फ योगी के प्रति निष्ठावान है। इसीलिए जब गोरखनाथ मंदिर से हमने ‘योगी जी की सेना चली’ नाम की सीडी खरीदी और उसके एक गाने को आपत्तिजनक बताते हुए एक वामपंथी नेता ने जब गोरखपुर में प्रेस कांफ्रेंस किया तब चंद मिनटों के अंदर ही न सिर्फ वो सीडी मार्केट से गायब हो गई बल्कि हमें भी जितना जल्दी हो शहर से निकल जाने का सुझाव दिया जाने लगा। गौरतलब है कि इस एल्बम के एक गाने जिसका इस्तेमाल हमने अपनी फिल्म में भी किया है में देवरिया के मोहन मुंडेरा कांड जिसमें 76 मुसलमानों के घर मस्जिद में लगे माईक को निकाल कर दिए गए योगी के भाषण के बाद हिंदू युवा वाहिनी के कार्यकताओं ने जला दिया था, का श्रेय लिया गया था। जबकि कोर्ट में हिंदू युवा वाहिनी इस घटना में अपनी संलिप्तता से इंकार करती रही है। गीत के बोल थे ‘घेर के मारल गइलें विधर्मी घरवा गईल फुंंकाए ,,,युवा वाहिनी के सपना साकार हो जाई’।
इसीलिए जब लोगों ने योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनने पर बधाई दी तो मुझे उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज न करने वाले पुलिस अधिकारियों, जांच अधिकारियों, उन्हें बचाने वाले जजों, उनके खिलाफ खबरों को छुपाने वाले पत्रकारों, गैरभाजपाई मुख्यमंत्रियों मुलायम सिंह यादव, मायावती और अखिलेश यादव सब के प्र्रति नाइंसाफी पर बहुत दया आई। आखिर योगी की सफलता में इनके योगदान को क्यों भुला दिया गया? इन्हें क्यों नहीं बधाई दी गई?
दरअसल, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि योगी आदित्यनाथ एक ऐसी राजनीतिक और सांस्कृतिक परिघटना की उपज हैं जो भारतीय राष्ट्र राज्य के साथ-साथ ही विकसित हुआ है और अपने मूल में हर उस मूल्य का सिर्फ प्रतिलोम ही नहीं रहा है जिसका दावा भारतीय राज्य औपचारिक तौर पर करता है बल्कि उसके घोषित मान्यताओं को नकारने और उसके महान लक्ष्यों को बदल देने के लिए हमेशा तत्पर भी रहता रहा है। सबसे अहम कि यह परिघटना इतनी स्वाभाविक मान ली गई है कि इसे कहीं से भी नुकसानदायक तो दूर असामान्य तक मानने को लोग तैयार नहीं हैं। इसीलिए किसी सामान्य व्यक्ति के लिए जिस तरह योगी का एक ‘फायरब्रांड’ नेता होना स्वीकार्य है उसी तरह उसके लिए यह जानकारी भी परेशान करने वाली नहीं है कि गांधी जी की हत्या में गोरखनाथ पीठ की ही रिवाल्वर का इस्तेमाल हुआ बताया जाता है या खुद दिग्विजय नाथ गांधी जी की हत्या के आरोप में जेल जा चुके हैं या बाबरी मस्जिद में रात के अंधेरे में राम की मूर्तियां रखने के एक आरोपी दिग्विजय नाथ भी थे। इसीलिए भारतीय राष्ट्र राज्य के अस्त्तिव में आते ही भारत के वर्तमान और भविष्य को प्रभावित करने वाली जो दो नियामक घटनाएं हुईं- महात्मा गांधी की हत्या और बाबरी मस्जिद में मूतियों का रखा जाना, उसके आरोपी भौतिक केंद्र के सर्वेसर्वा का सबसे बड़े राज्य का मुख्यमंत्री बन जाने का एक स्पष्ट अर्थ है। यह उस भारत की हार है जो महात्मा गांधी की हत्या नहीं करता या जो बाबरी मस्जिद में रात के अंधेरे में मूर्ति नहीं रखता। इसीलिए योगी के ‘हेट स्पीच’ के समर्थकों को उन भाषणों में एक नए भारत के निमार्ण का संकल्प दिखता है। वही संकल्प जो गोडसे ने गांधी पर गोली चलाने से पहले या 1949 की 22-23 दिसम्बर की रात को बाबरी मस्जिद में मूर्ति रखते हुए लोगों ने लिया होगा।
इसीलिए, सिद्धार्थनगर में ‘हिंदू चेतना रैली’ को सम्बोधित करते हुए हिंदू युवा वाहिनी के एक बड़े नेता ने जब योगी और महिला नेताओं की उपस्थिति में मंच से मुस्लिम महिलाओं के कंकालों को कब्रिस्तानों से निकाल कर उनके साथ बलात्कार करने का आह्वान किया या जब उनके एक नेता ने मुसलमानों से वोट देने का अधिकार छीन लेने की बात की तब वहां मौजूद भीड़, मीडिया और पुलिसकर्मियों का उत्साह  देखकर मुझे ऐसा कभी नहीं लगा कि मैं कुछ नया देख रहा हूं। उन्हें देखकर यही महसूस हुआ कि ये बात वो शायद बहुत दिनों से कहना चाहते थे लेकिन किसी दबाव में वे ऐसा नहीं कह पा रहे थे। मेरी फिल्म के एक विजूअल में इस भाषण पर एक पुलिसकर्मी का माथे पर भगवा पट्टा लपेटे और हाथ में फरसा लिए हिंदू युवा वाहिनी के कार्यकर्ता मंे रूपांतरित होना कहीं से भी अस्वाभाविक नहीं लगता। यही इस रूपातंरण का सबसे खतरनाक पहलू है। हां, यहां मुझे उस समान जेहनियत वाली भीड़ में उस असामान्य आदमी की जरूर याद आती है जिसने सिद्धार्थनगर की उस सभा में अपने हम उम्र बच्चों के साथ दौड़ भाग करते 8-10 साल के लड़के को उसके मुस्लिम होने की वजह से वहां से भगाने का विरोध करते हुए अपने एक योगी भक्त कार्यकर्ता से ऐसा नहीं करने को कहा था कि ‘लईका ह खेले द’। मैं उसके बारे में अक्सर सोचता हूं कि क्या वह अब भी ‘अपने’ को बचा पाया होगा या औरों की तरह हो गया होगा ?
इसीलिए जब 2 अप्रैल को इलाहाबाद हाईकोर्ट परिसर में इलाहाबाद हाईकोर्ट के कार्यक्रम में बतौर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट के माननीय न्यायधीशों के साथ पूरे सूबे भर के जजों के सामने बैठेंगे तो उसे भी शायद एक सामान्य घटना ही माना जाए और  शायद जजों का एक बड़ा हिस्सा उनके पैर छू कर उनसे आर्शिवाद भी ले जैसा कि गोरखपुर में अधिकतर सरकारी नौकरों को करने में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगता। उन्हंे इससे शायद ही फर्क पड़े कि योगी आदित्यनाथ के खिलाफ कई मामलों में उन्हें जल्दी ही फैसला भी सुनाना है और आरोपी के साथ सार्वजनिक या गुप्त तौर पर नजर आना नैतिक तौर पर गलत है।
लेकिन जब ऐसा हो रहा होगा तब मुझे अपने एक पत्रकार दोस्त के दिवंगत पिता की याद बार-बार आएगी। जो आजमगढ़ में जज थे और जिनकी मृत्यु कोर्ट परिसर में आए हार्ट अटैक से इसलिए नहीं टल सकी  कि उन्होंने एक वकील की अपने स्कूटर से अस्पताल छोड़ देने की पेशकश को मानने से इंकार कर दिया था। उन्हें एक जज का किसी वकील के स्कूटर से अपनी जान बचाने के लिए भी अस्पताल जाना नैतिक तौर पर गलत लगा था।
                           
             (स्वतंत्र लेखक, डाॅक्यूमेंट्री फिल्मकार, और राजनीतिक कार्यकर्ता)
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मंगलवार, 24 जनवरी 2017

राष्ट्रगान विवादः क्या हम अमरीका से नहीं सीख सकते

       
                                                                                शाहनवाज आलम

मलयाली के चर्चित लेखक कमल चवारा को अपने फेसबुक पर कथित तौर पर राष्ट्रगान के अपमान के आरोप में केरल पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए जाने से एक बार फिर सप्रीम कोर्ट का वह फैसला बहस के कंेद्र में आ गया है जिसमें उसने सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले इसे बजाए जाने और सभी का खड़े होना अनिवार्य बताया है। गौरतलब है कि कमल चवारा से पहले भी गोवा मंे एक विकलांग व्यक्ति को सिनेमा घर में लोगों ने राष्ट्र गीत के समय नहीं खड़े होने पर पीटा था और हाल में चेन्नई में एक फिल्म महोत्सव के दौरान भी ऐसे ही आरोप में 6 लोगांे को पुलिस ने गिरफ्तार किया था।

इन घटनाओं मंे एक खास संदर्भ का जिक्र किया जाना जरूरी है कि पुलिस में शिकायत करने वाले लोग एक खास वैचारिक-राजनीतिक समूह से ताल्लुक रखने वाले हैं। मसलन, कमल चवारा के मामले मंे शिकायतकर्ता भाजपा नेता है जिसने चवारा के उस पोस्ट को राष्ट्रविरोधी बताया है जिसमें लेखक ने अपने एक अप्रकाशित उपन्यास के एक हिस्से को फेसबुक पर डाला था। जिसमें एक स्कूल का जिक्र है जहां शिक्षक छात्रों को कक्षा के दौरान शौचालय जाने की इजाजत नहीं देते। दोपहर 4 बजे कक्षा के खत्म होने पर छात्र राष्ट्रगान गाते हैं। ऐसे में छात्रों के लिए राष्ट्रगान का मतलब होता है कि वे अब शौचालय जा सकते हैं। जाहिर है कोई भी विवकेशील और प्राकृतिक जरूरतों से वाकिफ व्यक्ति बच्चों से जुड़े इस घटनाक्रम को कथित राष्ट्रवाद के नजरिए से नहीं देख सकता। अगर वो ऐसा करता है तो उसे या तो बच्चों की प्राकृतिक जरूरतों का ज्ञान नहीं है या फिर वो किसी ऐसी विचारधारा का शिकार है जिसने उसे इंसान छोड़ा ही नहीं है। क्योंकि किसी बच्चे को कभी भी बाथरूम जाने की जरूरत पड़ सकती है और ऐसी स्थिति में अगर उसका शिक्षक उसे पहले राष्ट्रगान गवाए तो बच्चे राष्ट्रगान को अपनी प्राकृतिक जरूरतों के बीच एक बाधा के बतौर ही देखेंगे।

इसलिए इस मुद्दे के बहाने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर बहस होनी चाहिए जिसकी आड़ में राष्ट्रवाद का एक अमानवीय और अस्वाभाविक संस्करण तैयार किया जा रहा है। जाहिर है जिस फैसले का सबसे ज्यादा उपयोग या दुरूपयोग अगर सत्ताधारी पार्टी और उसकी वैचारिकी से जुड़े लोग करते हैं तो उस फैसले को भी एक राजनीतिक और विचारधारात्मक फैसला ही माना जाएगा और इसी नजरिए से उसपर बात भी होनी चाहिए। सवाल यह भी होना चाहिए कि क्या अदालत या किसी जज को इसतरह की छूट दी जा सकती है कि वह अपने ही पुराने फैसलों को बिना जेरे गौर लाए सत्ता के विचारधारा से रंगा फैसला सुनाए। ये सवाल इसलिए भी अहम है कि सुप्रीम कोर्ट ने प्रोफेसर बीज्यू एमेन्यूएल केस में दिए गए अपने ही ऐतिहासिक फैसले को भी संदर्भ में नहीं लिया। जिसका जिक्र पूर्व एटर्नी जनरल सोली सोराबजी ने भी इस फैसले पर आपत्ती जाहिर करते हुए किया है कि जजों ने 1985 के अपने ही फैसले को नजरअंदाज कर दिया जिसमें ऐसे ही मामले में जब तीन बच्चे इसलिए राष्ट्रगान में खड़े नहीं हुए थे क्यांेकि वे जिस जेहावा मजहब को मानते हैं उसमें ईश्वर के अलावा किसी और की वंदना नहीं की जाती। उक्त फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि राष्ट्रगान नहीं गाना राष्ट्रगान का अपमान नहीं है।

इस रोशनी में देखा जाए तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने राष्ट्रवाद के हिंदुत्ववादी परिभाषा पर ही मुहर लगाई है। इसीलिए इस मुद्दे पर समाज विचारधारात्मक आधार पर बंट गया है जो न्यायपालिका की छवि के लिए ठीक नहीं है। क्योंकि जहां इससे देश की बहुलतावादी संस्कृति पर अदालत के उकसावे से हमले बढे़ंगे वहीं सभ्यतागत विकास की धारा भी ठहर जाएगी। जिसके लिए व्यक्तियों और समुदायों में वैचारिक और सांस्कृतिक मतभिन्नता का स्पेस सबसे जरूरी होता है।

दरअसल इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला खुद अपने आप में अस्पष्ट और अंतरविरोधी भी है। मसलन, इसमें कहा गया है कि राष्ट्रगान का किसी भी तरह का व्यावसायिक इस्तेमाल नहीं हो सकता जिससे कोई भी किसी तरह का व्यावसायिक लाभ नहीं उठा सके। जबकि सिनेमा हाॅल अपने आप में एक व्यावसायिक केंद्र होते हैं जिन्हें आर्थिक लाभ के लिए ही संचालित किए जाते हैं। वहीं बदलते समय में राजनीति भी व्यवसाय ही बन गई है जहां राष्ट्र गान और राष्ट्रवाद की सबसे ज्यादा तिजारत की जाती है। वहीं इस फैसले में यह भी कहा गया है कि इसे किसी मनोरंजन कार्यक्रम का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता है, जबकि सिनेमा हाॅल में अधिकतर लोग सिर्फ मनोरंजन के उद्येश्य से ही जाते हैं और सिनेमा हाॅल मनोरंजन कर भी देते हैं। यानी ये फैसला ही अपने आप में न्यायिक भाषा में कहें तो ‘नाॅन ऐप्लिकेशन आॅफ माइंड’ का बनता है और इसमें तार्किक आधार पर फैसले पर पहंुचने के बजाए हठ और हड़बड़ी ज्यादा दिखती है। इसीलिए समाज का एक बड़ा तबका इसे न्यायिक के बजाए राजनीतिक फैसले के बतौर देख रहा है।

दरअसल किसी भी पिछले वक्त से ज्यादा आज यह याद रखने की जरूरत है कि पूरी दुनिया में जितने लोग राष्ट्रवाद नाम के उन्माद में मारे गए हैं उतना किसी और कारण से नहीं मारे गए। किसी को राष्ट्रवाद के नाम पर उत्पीड़ित करना सबसे निकृष्टतम अपराध है जिसमें अपराधी किसी भी अन्य तरह के अपराधों के मुकाबले ज्यादा अतार्किक कारणों से हिंसा करता है। क्योंकि वो जिस आधार पर हिंसा करता है या दंड देता है उसका कोई स्पष्ट और स्थाई स्वरूप नहीं होता, सिर्फ काल्पनिक और मनोगत धारणा होती है। मसलन, भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी जब बटवारे से पहले मौजूदा पाकिस्तान में रहते थे तब उनके लिए भारत माता और राष्ट्रवाद की भौगोलिक सीमा मंे मौजूदा पाकिस्तान से लेकर बांग्लादेश तक सब आता होगा। लेकिन बटवारे और उनके भारत आ जाने के बाद वो संकुचित हो गया। ये परिर्वतन सिर्फ 70 सालों में हुआ है। इसलिए आज से सौ दो सौल बाद भारतीय राष्ट्रवाद की भौगोलिक सीमा क्या होगी ये कोई नहीं जानता। दरअसल, राष्ट्रवाद अपने आप में हिंसक कबीलाई संस्कृति के अवशेष के अलावा कुछ भी नहीं है। जिसकी संचालक शक्ति दूसरे भौगोलिक और जातिय समुदायों से नफरत और उनके अस्तित्व का नकार है। इसीलिए राष्ट्रवाद तार्किक और ठोस धरातल पर कोई बात नहीं करता वो दूसरों के पतन की काल्पनिक कहानियां गढ़ता और सुनाता है। इकबाल का मशहूर तराना ‘सारे जहां से अच्छा’ इसका सबसे अच्छा सुबूत है। जब वो कहते हैं ‘यूनान-ओ-मिस्र-ओ रोमा, सब मिट गए जहां से, अब तक मगर है बाकी नामो-ओ-निशां हमारा’। अब कोई मूर्ख ही होगा जो ये माने कि यूनान, मिस्र और रोम दुनिया से मिट चुके हैं और सिर्फ भारत ही धरती पर एक मात्र देश बचा है। कल्पना करिए कि भारतीय खिलाड़ी दल इन तीनों में से किसी एक देश में हो रहे ओलम्पिक में शामिल होने गया हो और यही तराना हमारा राष्ट्रगान हो। नियम के मुताबिक लाखों स्थानीय दशर्कों से भरे स्टेडियम में हमारा दल अपना राष्ट्रगान गाता और उन्हें बताता कि उनके देश का तो नामोनिशान मिट चुका है, तो इसके क्या परिणाम होते? कोई भी खिलाड़ी वापस सकुशल लौट पाता?

दरअसल हमें ऐसी घटनाओं पर दूसरे देशों के अनुभवों से सीख लेनी चाहिए। मसलन, अश्वेत अमरीकी एथलीट काॅलिन केपरनिक पिछले दिनों राष्ट्रगान के दौरान अश्वेतों पर बढ़ती हिंसा के विरोध स्वरूप खड़े नहीं हुए। जिसपर वहां के कथित श्वेत राष्ट्रवादियों ने हंगामा मचा दिया। लेकिन दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति ओबामा ने यह कह कर पूरी दुनिया के संकिर्णतावादियों को खामोश कर दिया कि वे केपरनिक की भावनाओं का सम्मान करते हैं और ऐसा करके उन्होंने संविधानप्रदत असहमत होने के अधिकार का ही इस्तेमाल किया है। उन्होेंने आगे कहा कि हमारे संविधान, हमारे अभिव्यक्ति के अधिकार के प्रति हम कितने निष्ठावान हैं इसकी परिक्षा तब पास करना ज्यादा जरूरी होता है जब स्थितियां बहुत कठिन हों।

इसलिए अगर एक बेहतर देश बनना है तो न्यायपालिका को संकिर्णता से बचना होगा। उसे जेरे बहस राष्ट्रगान के मुद्दे पर उसके रचईता टैगोर के इन शब्दों को जरूर याद रखना चाहिए कि ‘मेरे देशवासी अपने वास्तविक भारत को तभी प्राप्त कर पाएंगे जब वे उस धारणा से लड़ पाएंगे जो उन्हें सिखाती है कि देश मानवता के आर्दशों से बड़ा होता है।

जनता लेगी हिसाब नागपुर से बनकर आया है सपा का चुनावी घोषणा-पत्र

आतंकवाद के नाम कैद बेगुनाहों की रिहाई का एजेण्डा अब अखिलेश का एजेण्डा नहीं - रिहाई मंच
भाजपा के नक्शे कदम पर अखिलेश, सच्चर-रंगनाथ को मानने लगे हैं मुस्लिम तुष्टीकरण 
चुनावी घोषणा पत्र से गायब कर देने मात्र से सवाल गायब नहीं होंगे
जनता लेगी हिसाब
नागपुर से बनकर आया है सपा का चुनावी घोषणा-पत्र 


लखनऊ 22 जनवरी 2017। रिहाई मंच ने समाजवादी पार्टी के 2017 के चुनावी घोषणा-पत्र में मुसलमानों के मुद्दों से अखिलेश यादव पर पीछे हटने का आरोप लगाया है। मंच ने आतंकवाद के नाम पर बंद बेगुनाहों को छोड़ने व उनके पुर्नवास-मुआवजा, सच्चर-रंगनाथ आयोगों की रिपोर्टों पर सांप्रदायिक जेहनियत के तहत अमल न कर पाने वाले अखिलेश यादव से पूछा हैे कि यह मुद्दे इस बार गायब क्यों है। सिर्फ चुनावी घोषणा-पत्र से गायब कर देने मात्र से सवाल गायब नहीं होंगे जनता चुनावों में इसका हिसाब मांगेगी।  
रिहाई मंच अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब ने कहा कि अखिलेश यादव को यह भ्रम है कि वह आतंकवाद के नाम पर बेगुनाह मौलाना खालिद मुजाहिद, जियाउल हक, दादरी में अखलाक की हत्या, मुजफ्फरनगर, कोसीकलां, फैजाबाद, अस्थान में दंगे करवाते रहेंगे और मुसलमान उन्हें विकास के नाम पर वोट दे देगा। इस घोषणापत्र में अल्पसंख्यकोें की सुरक्षा व धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के वादे पर रिहाई मंच अध्यक्ष ने पूछा कि जब पुलिस की हिरासत में ही मौलाना खालिद मुलाहिद की हत्या कर दी जाती हो और अखिलेश उसको स्वाभाविक मौत बताते हों या अखलाक को घर से खींचकर भाजपा के लोग  मार डालते हों और सरकार हत्यारों को बचाने के लिए सीबीआई जांच नहीं करवाती और हत्यारे को तिरंगे में लपेटा जाता हो, जिनकी सरकार में रघुराज प्रताप सिंह जैसे गुण्डों को मंत्री बनाकर ईमानदार पुलिस अधिकारी जियाउल हक की सरेआम हत्या करवा दी जाती हो वह किस मुंह से मुसलमानों की सुरक्षा की बात कर सकते हैं। पूरी दुनिया ने देखा कि मुजफ्फरनगर में मां-बेटियों की अस्मत लूटी जा रही थी, बच्चे ठंड से मर रहे थे और बाप-बेटा सैफई में नाच करवा रहे थे। मुजफ्फरनगर के पीड़ितों को भिखारी कहने वाले आजम खां को जौहर विश्वविद्यालय के नाम पर सौगात देकर सांप्रदायिक हिंसा पीड़ितों का अखिलेश ने मजाक उड़ाया। संगीत सोम, सुरेश राणा से लेकर पूरे प्रदेश में हुई इस सरकार में रिकार्ड सांप्रदायिक हिंसा में किसी को भी सजा नहीं हुई। 

रिहाई मंच प्रवक्ता शाहनवाज आलम ने कहा कि सपा का यह चुनावी घोषणा पत्र नागपुर से बनकर आया है इसीलिए सांप्रदायिकता के विनाश जैसे सवालों को छापने की हिम्मत भी अखिलेश यादव नहीं कर पाए हैं। उन्होंने कहा कि अखिलेश ने पटना की मोदी की रैली में हुए धमाकों के बाद मिर्जापुर, फतेहपुर से तो वहीं मोदी के लखनऊ आने पर आईएस के नाम पर लखनऊ और कुशीनगर से, अलकायदा के नाम पर संभल जैसे जिलों से मुस्लिम युवकों को सालों जेलों में सड़ाने के लिए केन्द्रिय सुरक्षा एजेंसियों के हवाले कर दिया। कहां तो वादा था बेगुनाहों को रिहा करने का लेकिन जो लोग खुद अदालतों से  8-9 साल बाद बरी हुए उन्हें फिर जेल भिजवाने के लिए सरकार अदालत चली गई। धार्मिक स्वतन्त्रता की बात करने से पहले अखिलेश यादव को बताना चाहिए कि लव जेहाद के नाम पर उनकी सरकार में मुस्लिम युवाओं पर हमले किए गए और भड़काऊ भाषण देकर साक्षी महराज, योगी आदित्यनाथ जैसे भाजपा सांसद समाज में आग लगाते रहे और उनपर उन्होंने कोई कार्रवाई क्यों नहीं की। 

द्वारा जारी 
शाहनवाज आलम
प्रवक्ता रिहाई मंच
9415254919
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Office - 110/46, Harinath Banerjee Street, Naya Gaaon (E), Laatouche
Road, Lucknow

शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

सामाजिक-आर्थिक बराबरी और न्याय के लिए जारी संघर्षों के अथक योद्धा थे प्रो. तुलसी राम- जन संस्कृति मंच

प्रो. तुलसी राम को जन संस्कृति मंच की ओर से श्रद्धांजलि

सामाजिक-आर्थिक बराबरी और न्याय के लिए जारी
संघर्षों के अथक योद्धा थे प्रो. तुलसी राम- जन संस्कृति मंच


प्रो. तुलसी राम का असामयिक निधन भारत की तर्कशील भौतिकवादी बौद्धिक परंपरा तथा वाम-दलित आंदोलन के लिए अपूरणीय क्षति है। 65 साल की उम्र में उनका आज 13 फरवरी को फरीदाबाद के राकलैंड अस्पताल में निधन हो गया। सांप्रदायिक-धार्मिक हिंसा, अवैज्ञानिकता और सामाजिक-आर्थिक भेदभाव संबंधी राजनीति, सामाजिक-सांस्कृतिक धारणाओं, विचारों और संस्कारों के खिलाफ वे आखिरी दम तक संघर्ष करते रहे।

प्रो. तुलसी राम डायबिटीज की बीमारी से गंभीर रूप से ग्रस्त थे और पिछले कई वर्षों से नियमित अंतराल पर डायलिसिस की विवशता के बावजूद वे न केवल लेखन के क्षेत्र में सक्रिय थे, बल्कि देश के विभिन्न इलाकों में लगातार यात्राएं करते हुए सभा-गोष्ठियों, अकादमिक बहसों में शामिल होकर हमारे समय की जनविरोधी राजनीतिक-सांस्कृतिक और आर्थिक ताकतों के खिलाफ तीखा वैचारिक संघर्ष चला रहे थे।

तुलसी राम जी का जन्म 1 जुलाई 1949 को उ.प्र. आजमगढ़ जनपद के धरमपुर गांव में हुआ था। अपनी आत्मकथा में उन्होंने अपने परिवार, गांव के सामाजिक परिवेश और अपने प्रारंभिक संघर्ष के बारे में विस्तार से लिखा है कि किस प्रकार वे आजमगढ़ नगर और फिर बी.एच.यू., बनारस पहुंचे। बी.एच.यू. में कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया और ए.आई.एस.एफ. से जुड़कर वामपंथी राजनीति के अंग बने। सी.पी.आई. की राजनीति के साथ अपने स्याह-सफेद अनुभवों को जीने की प्रक्रिया में वे जे.एन.यू. आए और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में शोध के उपरांत जे.एन.यू. में ही प्रोफेसर नियुक्त हुए।

प्रो. तुलसी राम का जीवन संघर्ष आजादी के बाद के भारत में दलित वर्ग के ऊर्ध्वगामी जययात्रा की दास्तान की तरह है। तुलसी राम आजाद भारत में पैदा हुए दलितों की पहली पीढ़ी के उन लोगों में से रहे हैं, जो अपमान-अन्याय का दंश झेलते हुए अपने संघर्ष की बदौलत भारत के सर्वोच्च शिक्षण संस्थानों में पहुंचे। तुलसी राम की आत्मकथा के दूसरे खंड ‘मणिकर्णिका' में देखा जा सकता है कि किस प्रकार बी.एच.यू. जैसा उच्च शैक्षणिक संस्थान तुलसी राम को गढ़ता है, उन्हें प्रभावित करता है और खुद तुलसी राम विश्वविद्यालय की वामपंथी छात्र-राजनीति में शामिल होकर विश्वविद्यालय की परिसर-संस्कृति को बदलने में अपनी भूमिका निभाते हैं।

प्रो. तुलसी राम के चिंतन और अध्ययन और सक्रियता का रेंज बहुत ही व्यापक रहा है। वामपंथी राजनीति से जुड़े रहने के कारण वे मार्क्सवाद और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, खासकर सोवियत संघ के दौर की अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के गंभीर अध्येता रहे। मार्क्सवाद को समझने-पढ़ने के समानांतर उन्होंने बौद्ध दर्शन और अंबेडकरवाद का अध्ययन किया और अपने राजनैतिक-दर्शन में आत्मसात किया। उल्लेखनीय है कि अंबेडकरवादी चिंतन में निष्णात होने के साथ-साथ वह अंतिम सांस तक कम्युनिस्ट बने रहे। कम्युनिस्ट पार्टी के कार्य-व्यवहार में जाति के प्रश्न को उन्होंने विभिन्न मंचों पर उठाया। वे इस सवाल को मार्क्सवादी सांगठनिक प्रणाली के भीतर आलोचना-आत्मालोचना के माध्यम से हल करना चाहते थे। यही कारण है कि कई भूतपूर्व कम्युनिस्टों और वामपंथी विचारधारा या पार्टी के नजदीक रहे बुद्धिजीवियों की तरह उन्होंने कभी कम्युनिस्ट पार्टी के खिलाफ सार्वजनिक बयानबाजी नहीं की, न ही अपनी आलोचनाओं को सार्वजनिक मंच पर व्यक्त किया।

आज जब भारत में दलित आंदोलन गंभीर संकट से गुजर रहा है, दलित आंदोलन और चिंतन के भीतर गहरे आत्ममंथन और आत्मसंघर्ष का दौर चल रहा है, तब तुलसीराम जी की कमी हमें बहुत खलेगी। आज के इस दुविधा भरे समय में तुलसीराम जी का मार्ग निर्देशन और वैचारिक नेतृत्व की हमें बहुत जरूरत थी। तुलसी राम जी वर्तमान दौर की दलित राजनीति के अवसरवाद और सत्तापरस्ती के सबसे बड़े आलोचक थे। वे कहते थे कि दलित आंदोलन के लिए यह सबसे खतरनाक है कि दलित जातिवादी हो जाए और बसपा की राजनीति के विषय में वे कहते थे कि बसपा दलितों को जातिवादी बना रही है। 2014 के लोकसभा चुनावों के परिणामों के बाद नरेंद्र मोदी के रूप में कारपोरेट-फासीवाद की सत्ता के आरोहण के बाद प्रो. तुलसीराम ने ‘जनसत्ता’ में एक लेख लिखा था जिसमें उन्होंने दलितों के जातिवादी और सांप्रदायिक होते जाने के खतरे की ओर इंगित किया था। प्रो. तुलसी राम की आस्था मार्क्सवाद और अंबेडकरवाद में समान रूप से थी। भारतीय परिप्रेक्ष्य में मार्क्सवाद को लागू करने तथा समाजवादी समाज निर्माण की प्रक्रिया में अंबेडकर की भूमिका को वे महत्वपूर्ण मानते थे।

दलित साहित्य के संवर्धन और संवेदनात्मक विकास में प्रो. तुलसीराम की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने दलित लेखक संघ के अध्यक्ष के बतौर भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दलित साहित्य को संपूर्ण मानवता की मुक्ति के साहित्य के रूप में उन्होंने व्याख्यायित किया। दलित साहित्य की व्यापक स्वीकार्यता और उसे भारतीय साहित्य का अनिवार्य हिस्सा बनाने के लिहाज से उनके योगदान को कभी भी विस्मृत नहीं किया जा सकता। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था- ‘‘प्रश्न सवर्णों से घृणा करने का नहीं है। वर्णव्यवस्था से घृणा करने का है। इससे तो सिर्फ दलितों को ही नहीं, सवर्णों को भी घृणा करनी चाहिए। सवर्णों से घृणा न बुद्ध का लक्ष्य रहा है न बाबा साहब का। जहां तक दलित लेखन के लिए दलित ही होने की बात है तो मैं इससे सहमत नहीं हूं।’’


प्रो. तुलसी राम की आत्मकथा ‘मुर्दहिया' और ‘मणिकर्णिका’ अपनी रचनात्मक विशिष्टता, सरलता-सहजता और प्रामाणिक यथार्थ के कारण हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर बन चुकी है। इन पुस्तकों ने दलित रचनाशीलता के नए निकष बनाए हैं। एक वामपंथी होने के नाते प्रो. तुलसी राम आजीवन साम्राज्यवाद के विरोध में रहे। ‘सीआईए: राजनीतिक विध्वंस का अमीरीकी हथियार’, ‘द हिस्ट्री आफ कम्युनिस्ट मूवमेंट इन ईरान’, ‘आइडियोलाजी इन सोवियत ईरान रिलेशंस’ तथा ‘अंगोला का मुक्ति संघर्ष’ आदि उनकी अन्य प्रमुख किताबें हैं। प्रो. तुलसी राम ने ‘अश्वघोष’ पत्रिका का संपादन भी किया। इस पत्रिका का नाम भी भारत की तर्कशील दार्शनिक और साहित्यिक परंपरा के साथ उनके अटूट रिश्ते को जाहिर करता है।

गैरबराबरी, शोषण, उत्पीड़न-दमन के खिलाफ लड़ने और एक बेहतर मानवीय दुनिया बनाने के लिए संघर्ष करने वाले लोगों और संगठनों के लिए प्रो. तुलसी राम का निधन एक बहुत बड़े आघात की तरह है, जिससे उबरने में समय लगेगा। जन संस्कृति मंच की ओर से प्रो. तुलसी राम को विनम्र श्रद्धांजलि।

- रामायन राम


जन संस्कृति मंच की ओर से
राष्ट्रीय सहसचिव सुधीर सुमन द्वारा जारी

शुक्रवार, 9 मार्च 2012

जे.एन.यू छात्रसंघ में आइसा की जीत के मायने


खुल गया है झण्डा, हो गया है लाल,
आ गयी है आईसा, लगा लो आज गुलाल

आज ब्रज के नन्दगाँव व् बरसाना में लट्ठमार होली शुरू हुई तो शाम होते होते जेएनयू में भी गुलाल के होली शुरू हुई, दोनों ही बदलाव की उमंग के साथ फिजाओं में बिखरे थे. जहां ब्रज में जीवन के हर रंग का गुलाल मौसम के बदलाव दर्शाते है वही जेएनयू में पसरा लाल गुलाल, बंगाल व् केरल में लाल सलाम की हुई शिकस्तो के बाद क्रांतीकारी-लोकतान्त्रिक लेफ्ट विचारधारा के पुनर्जीवन का बदलाव अंगीकार किया हुए है.सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करीब चार साल बाद हुए जेएनयू छात्रसंघ चुनावों में उग्र-क्रांतिकारी वाम राजनीति करने वाले सीपीआई(माले ) से जुड़े छात्र संगठन आऐसा ने छात्रसंघ के सेंट्रल पैनल की सभी चार महत्वपूर्ण पदों पर भी कब्ज़ा कर लिया है, इसके साथ साथ 16 स्थानों पर खड़ें उनके 14 कौंसिलर भी इस जीत में शामिल है. आऐसा की तरफ से जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष पद जीतने वाली भूगोल की शोध छात्रा सुचेता डे ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की छात्र इकाई एसअफआई व् एक अन्य कम्युनिस्ट छात्र संगठन एएसआईअफ के संयुक्त उम्मीदवार जीको दासगुप्ता को करीब 1251 मतों से हरा कर छात्र राजनीति में वामपंथ की बदलती धारा को भी दर्शा दिया है.

इन चुनावों में यहाँ के 12 केन्द्रों की तीस कौंसिलर सीटो व् सेंट्रल पैनल के चार पदों के लिए तकरीबन 123 उम्मीदवारों ने विभिन्न छात्र संगठनो के बैनर तले चुनाव लड़ा. इन कौंसिलर सीटो में से 14 सीटें आऐसा ने जीती है तो प्रमुख विपक्ष भाजपा समर्थित एबीवीपी ने 2008 चुनावों की तरह ही 6 सीटो पर अपना कब्ज़ा बरकरार रखने के साथ साथ इसकी अध्यक्ष पद की प्रत्याशी ममता करीब साढ़े चार सौ मतों के साथ तीसरा स्थान लेने में कामयाब रही. कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयुआई ने तीन सीटो पर, मार्क्सवादियो के छात्र संगठन के गठबंधन कर दो सीटो पर तथा निर्दलियों ने तीन सीटो पर कब्ज़ा किया है. विभागों को देखे तो भाषा, साहित्य और संस्कृति अध्ययन केन्द्र (एस०एल० एल० और सी० एस०) की सभी कौंसिलर पांच सीटो पर, अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन केन्द्र (एस०आई०एस०) की पांच में से चार सीटो पर,सामजिक शास्त्र केंद्र की की पांच में से चार सीटो पर कब्ज़ा कर लिया है . इसमें गौरतलब बात ये है की इन्ही तीनो केन्द्रों से जेएनयू के तकरीबन 85 फीसद छात्र आते है. संगणक और प्रणाली विज्ञानं केंद्र (एस०सी०एस०एस०) की सभी तीन सीटो पर एबीवीपी की तीन उम्मीदवार सफल हुए है तो जीव विज्ञान केंद्र (एस०एल०एस०) की सभी तीन सीटो पर एनएसयुआई के प्रत्याशी विजयी हुए है. सनद रहे संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर) व् बायोटेकनोलोजी की क्रान्ती से अविभूत होकर शहरी युवा इन केन्द्रों में अधिक है. तीन निर्दलीय में से एक भौतिक विज्ञानं केंद्र व् दो पर्यावरण विज्ञानं केंद्र से जीते है.

सेन्ट्रल पैनल पर पार्टीवार नज़र डाले तो, पायेंगे की जितने वाली आएसा की तरफ से अध्यक्ष पद पर खड़ी उम्मीदवार सुचेता डे को 2102 मत मिले जो की उनके तीनो प्रतिद्वंदियों के संयुक्त वोटो की संख्या से भी ज्यादा है. सुचेता ने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी ‘जीको’ को 1351 मतों से करारी शिकस्त दी है वही इसी संगठन के उपाध्यक्ष पद पर जीते प्रत्याशी अभिषेक कुमार यादव को कुल 1997 वोट मिले, महासचिव पद पर जीत दर्ज करने वाले आइसा के रवि प्रकाश सिंह को 1908 मत मिले तो संयुक्त सचिव पद पर मोहम्मद फिरोज अहमद 1778 वोतो के साथ जीत का सेहरा बांधा. प्रमुख विपक्ष एसएफआई-एआईएसएफ गंठबंधन के जिको दासगुप्ता को अध्यक्ष पद के लिए वोट मिले तो, उपाध्यक्ष पद पर अनाघा को इंगोले को 1357 वोट,महासचिव पद पर दुर्गेश त्रिपाठी को 989 वोट ,संयुक्त सचिव पद पर मोहम्मद अल्तमस को 1199 वोट मिले. एबीवीपी उम्मीदवार की अध्यक्ष पद की उम्मीदवार ममता त्रिपाठी को 447 वोट,उपाध्यक्ष पद पर सुभाष बाबू आर्य को 392 वोट मिले तो महासचिव पद पर जेएनयू इकाई अध्यक्ष गायत्री दीक्षित को 577 वोट व् के साथ ही संतोष करना पड़ा.एबीवीपी की एकमात्र बड़ी कामयाबी सन 2000 में अध्यक्ष पद पर संदीप महापात्रा की जीत व् संयुक्त सचिव पद पर माखन सैकिया की जीत के साथ मिली  एनएसयूआई की तरफ से जेएनयू इकाई अध्यक्ष व जनरल सेक्रेट्री पद के उम्मीदवार मनोरंजन महापात्रा ही एकमात्र मजबूत प्रत्याशी रहे उन्हें सबसे अधिक 625 वोट मिले, उसके बाद उपाध्यक्ष के लिए खड़ी रीतिका दत्ता को 540 , ज्वाइंट सेक्रेट्री के लिए देवधर दाधिच को 480 व् अध्यक्ष पद पर लड़ रहे मुराद खान को सबसे कम 209 मत मिले. इनके अलावा आरक्षण के विरोध में खड़ी यूथ फोर इक्वेलिटी व् जातीय सत्यता को विकृत रूप से विष वमनकर, सामाजिक न्याय का विपण करने वाली नवसृजित एआईबीएसएफ को भी छात्रों ने सिरे से नकार दिया है.

एक नया भारत एक नयी दुनिया के नारे के साथ 1990 के रामलहर काल में इलाहबाद में अगस्त क्रांति के दिन 9 अगस्त को जन्मी ‘आऐसा’ हुआ था,उस समय इसको चंद्रशेखर प्रसाद सरीखे लीडरो ने परवान चढाया था. ज्यादातर यूपी बिहार के समाजवादियो वाले इस क्रांतिकारी कम्युनिस्ट संगठन ने कम्युनिस्ट पार्टी (माले) के काडर को बौद्धिक विस्तार दिया है. अपने उदय के बाद से ही वे इलाहबाद, बीएचयू, कुमाऊ सरीखी दक्षिणपंथी वर्चस्व वाले छात्रसंघो को परास्त करते आए है. सन  2007 में हुए छात्रसंघ चुनावों में भी आऐसा ने सेन्ट्रल पनेल की इन चारो सीटो पर सफलता पायी थी तब उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के पीएचडी छात्र व् संगठन के सबसे फायरब्रांड नेता संदीप सिंह ने यूथ फॉर एकुँलिटी की बबिता शर्मा को 300 मतों से हराया था. उन चुनावों में आऐसा से  उपाध्यक्ष पद के लिए सेफालिका शेखर, महासचिव पद के लिए पल्लवी डेका, संयुक्त सचिव पद पर मोहम्मद मोबीन आलम जीते थे. उन चुनावों में भी मुख्य विपक्ष  एसएफआई-एआईएसएफ गंठबंधन अपना खाता नहीं खोल पायी था, संदीप सिंह ने तब कहा था की अपनी जरुरत के हिसाब से मार्क्स के सिद्धांतो का उपयोग करने वाली सत्ताधारी सीपीएम्, स्पेशल इकोनोमिक ज़ोन, नंदीग्राम-सिंगुर में भूमि अधिग्रहण के साथ साथ लोकदमन और खुली अर्थव्यस्था के प्रेम के खिलाफ ये छात्रों का मत है. हालांकि रिजवानुर और नंदीग्राम की किरिकिरी  सीपीएम  -सीपीआई समर्थित  एसएफआई-एआईएसएफ गंठबंधन की हार की ज्यादा बड़ी वजह थी.आऐसा ऐसे ही कामयाब नहीं हो गयी, सन 2003 में जब जेएनयू लाल रंग से सराबोर था तब जेएनयू के ही आऐसा के कार्यकर्ताओं ने नंदीग्राम और  सिंगुर का मुद्दा उठा सत्ताधारी वामदलों को घेरा था. 2007 में आऐसा ने मदरसा छात्रों के अंकतालिका के आधार पर उन्हें जेएनयू में दाखिले के लिए आन्दोलन करा तो वही परम्परगत वाम लाइन पकडते हुए 2005 में नेस्ले जैसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी को बाहर का रास्ता दिखा दिया.

अतीत में सोमपुरा, नालंदा, तक्षशिला, भोजशिला विक्रम शिला जैसी कई समतामूलक, बौद्धिकता संवर्धक उच्च संस्थानों के भारत के गौरवमयी इतिहास के साक्षी है तो आजाद भारत में जेएनयू, बीएचयू ,एमयू, आइआईटी,आइआईएम्, दिल्ली, कलकत्ता, इलाहाबाद, मद्रास व् हैदराबाद के विश्वविद्यालय इसी क्रम को आगे बढाने का काम कर रहे है. द्विराष्ट्र सिद्धांत से भारत के बंटने के बाद इकबाल व् सावरकर के सिद्धांतो से अलग गंगा-जमुनी विचारधारा के प्रवर्तक नेहरु जी की याद में स्थापित ये विश्विद्यालय वैसे तो 1965 युद्ध में कुटनीतिक व् गुप्तचरी विफलताओ के बाद उच्च शोध के लिए बना था पर अपने वर्ग संघर्षो , जातीय समरसता, सामजिक न्याय व् समता के समाजवादी सिद्धांत पर चल जेनयु ने इन सब मे भारतीय समाज के बदलाव में जो मोड़ दिया है वो काबिले तारीफ़ है. मात्र 40 वर्ष की अल्पायु में विचारधाराओ, राष्ट्रीयता, धार्मिक मान्यताओं से ऊपर उठ कर मानव की श्रेष्ठता व् मानवीयता पर बल देने वाला ये विश्विद्यालय ना केवल भारतीय राजनीति बल्कि भारतीय समाज को भी नयी दिशा देता है. उच्च शिक्षा संस्थान में वंचितों की भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु अपने प्रमुख विदेशी भाषा के स्नातक पाठ्यक्रमों में मदरसों के छात्रों का सीधा दाखिला हो या फिर हिंदी उर्दू को एक साथ पढ़ाया जाना हो या फिर ओबीसी कट आफ के मसले पर मुखर्जी रिपोर्ट खारिज कर न्यूनतम जनरल प्रत्याशी के योग्यता अंको से 10 अंक कम करके पिछड़ों की ज्यादा से ज्यादा भागीदारी सुनिश्चित कराना हो जेएनयू सब में अग्रणी रहा है. भारत के दो दो प्रधान मंत्री इसी छात्र राजनीति की देन रहे है तो करीबन बीसियों मुख्यमंत्री इसी छात्र राजनीति की सीढियाँ चढ़कर अपने पदों तक पहुंचे है.1947-1948 में उदय प्रताप कॉलेज, वाराणसी की विद्यार्थी यूनियन के अध्यक्ष व् इलाहाबाद विश्वविद्यालय की स्टूडेंट यूनियन में उपाध्यक्ष रहे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल कमीशन को लागू कर  भारतीय राजनीति में सामजिक बदलाव का जो अध्याय लिखा था उसके के लिए भारत की करीब आधी पिछड़ों की आबादी ताउम्र उनकी आभारी रहेगी.

हाल के वक़्त में देश में ये मान्यता काफी प्रगाढ़ हो गाये है की छात्र राजनीति अब राजनीति रहकर गुंडई का मरकज़ बन गयी है, फिर चाहे गोरखपुर लखनऊ के विश्वविद्यालय में छात्र नेताओ का रेलवे ठेकेदारी में हिस्सेदारी के लिए खूनी संघर्ष हो या फिर दिसंबर 2010 में अबतक लगातार चली आ रही तृणमूल छात्र यूनियन व्  वामपंथी छात्र यूनियन स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) का खूनी संघर्ष हो या फिर केरल में पोपुलर फ्रंट की छात्र इकाई कैम्पस फ्रंट के द्वारा प्रोफेस्सर टी जे जोसेफ का हाथ काटना हो या फिर संघ समर्थित एबीवीपी कार्यकर्ताओं की वजह से प्रो अच् अस सभ्रव्वाल की असामयिक मृत्यु हो, या गुजरात अभियांत्रिकी विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ अक्षय अग्रवाल के साथ एनएसयुआई  कार्यकर्ताओं का मारपीट व् तोड़फोड़ करना हो.ये सब बस बानगी है छात्रों के द्वार फैलाई गुंडागर्दियों की मगर इससे छात्रसंघ के चुनावों पर बैन लगा देना कोई हल नहीं हो सकता. सन 2006 में लिन्दोह की अध्यक्षता में इन्ही सवालों को हल करने के लिए कमेटी बनी जिसकी सिफारिशो को जेएनयू   समेत देशभर के सब विश्विद्यालयो के छात्रसंघ चुनावों के लिए लागू कर दिए गए है  . सन 2008 में कोर्ट ने जेएनयू छात्रसंघ के चुनावों में लिंगदोह कमेटी की नियमावली के उल्लंघन माना और अपने आदेश के उल्लंघन के कारण चुनावों पर रोक लगाकर, जेएनयूके दो अधिकारियों को अवमानना का नोटिस दिया था.पिछले साल दिसंबर में कोर्ट ने लिंगदोह कमेटी की कुछ शर्तो में ढीलायी कर मसलन उम्मीदवारों की उम्र तीस वर्ष व् 75 % अटेनडेंस की अनिवार्यता से मुक्त कर दिया तब लगभग एक सेमस्टर बीत जाने पर इस वर्ष के चुनाव से सिर्फ 6 महीने का कार्यकाल ही मिल पायेगा.इन सब बातो के मद्देनज़र इस बार का चुनाव वामपंथी चिंतन की गर्मी या देश की मौजूदा हालत के चिंतन पर केन्द्रित ना होकर छात्रसंघों में लिंगदोह कमेटी की तजवीजो के खिलाफ पड़ा वोट है.गौरतलब बात है की कमेटी की बहुत सारी सिफारिशे छात्रो को अव्यवहारिक लगती रही है मसलन आल इंडिया बैकवर्ड स्‍टूडेंस फोरम (एआइबीएसएफ)के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार और यूनाईटेड दलित स्‍टूडेंटस फोरम (यूडीएसएफ) द्वारा समर्थित जीतेन्द्र कुमार यादव का कहना है की अगर पिछड़ों व् दलितों को हर जगह 5 साल की आयु छूट मिलती है तो छात्रसंघ चुनावों में क्यों नहीं ये व्यवस्था है. सुचेता डे के शब्दों में ही ” आऐसा की जीत उसकी सामाजिक भागीदारिता, उच्च शिक्षा को सस्ता और सुलभ बनाने के लिए, लिंगदोह कमेटी की तजवीजो के खिलाफ व् लोगो की सेज, आफ्सपा कानून, आपरेशन ग्रीन हंट के खिलाफ है”

आज मतदाताओं का एक बहुत बड़ा वर्ग 18 से 25 साल के हैं, हाल ही में संपन्न यूपी में तो इनकी संख्या करीबन 10%के करीब थी. इस वर्ग का अपना हित है इसे शिक्ष व् उसके बाद रोज़गार से अधिक सरोकार है, राजनीति से घृणा इसका स्टाइल स्टेटमेंट है. इस वर्ग को ना ही चुनावी प्रक्रिया के बारे में पता है ना ही उसे जानना है, ये स्तिथि युवक कांग्रेस जैसी संस्थाओं में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए नेतापुत्रो के बड़ी मुफीद होती है उन्हें बिना किसी पोलिटिकल टैलेट की प्रतीस्पर्धा के राज करने का लाइसेंस मिल जाता है. इस राजनैतिक डेफिसिट को छात्रसंघ चुनावों में छत्रो की सक्रिय भूमिका के द्वारा खत्म किया जा सकता है. अगर कालेज के दिनों में ही छात्रों को वोट के महत्व, टिकट बंटवारे, निर्णय प्रक्रिया, प्रचार प्रक्रिया और वोटिंग के बारे में मालूम हो तो निश्चय ही लोकतंत्र मजबूत होगा.अगर विश्वविद्यालयों में राजनीतिक प्रक्रिया का पालन, प्रमुख दलों छात्र संगठन करे तब अधिकांश छात्र राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा बन राजनैतिक दक्षता प्राप्त करते इनमे सी कुछ चुनिन्दा लोग लोकतान्त्रिक प्रणाली को मजबूत करने के लिए राजनीती में भी आ जाते जैसा की 1974 की छात्र राजनीति के संपूर्ण क्राँती अभियान के बाद हुआ.

खैर छात्र राजनीति में वैचारिक शिविर, आन्दोलन व्  देश की समस्याओं के कारणों पर बहस अब सिर्फ कुछ वामपंथी-संघी घटकों तक सीमित हो गयी है, और हाल के दशको में  बसपा के दलित आन्दोलन ने छात्र राजनीति के इस कांसेप्ट को सिरे से ही नकार दिया है. 2011 के अंत में हुए युवक कांग्रेस के बुनियाद शिविर में पार्टी के बड़े नेता बुलाकर युवाओं और छात्रों के सवालों जो मजमा लगा वो अब गायब ही हो गया है. बिहार जैसे राज्य में जहाँ सन्‌ सतहत्तर के आंदोलन में शामिल लोग जब  मुख्यमंत्री व् केंद्र में मंत्री बन गए तो इन लोगो ने जानबूझ बिहार में छात्र चुनावों को बंद करा दिया, तो वही दबे कुचलो की बात करने वाली माया ने छात्रो की आवाज़ बंद कर दी. हालांकि यूपी विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी ने 406 में से करीब 122 सीटें समाजवादी युवजन सभा व् अपने छात्रसंघों को दी है तो कांग्रेस ने 88 आरक्षित विधानसभा सीटो की जिम्मेवारी संसद व् जेएनयू छात्रनेता रहे युवा अशोक तंवर को सौंपी है. यूपी चुनावों में बढ़ रहा मतदान प्रतिशत स्पष्ट रूप से भारतीय लोकतंत्र में युवाओं की भागीदारिता का सूचकांक है. जेएनयू छात्र राजनीति से जुडे हुए सपा यूथ विंग के पूर्व राष्ट्रीय सचिव युद्दवीर सिंह कहते हैं, “समाज का पढ़ा लिखा और क्रीम तबका जो राजनीति के लिए अपने को सुटेबल नहीं मानता था, अखिलेश ने उन्हें राजनीति की मुख्यधारा में लाने की कोशिश की है.” ये सब युवाओं व् खासकर छात्रनेताओ के बढते कद व् छात्र राजनीति के बढते वृहद किरदार का द्योतक है.कम्युनिस्ट राजनीति को आगे बढ़ा रहे ज्योति बसु को सदैव छात्र महासंघों ने नए कैडर मुहय्या कराये है  तो  वही बिमान बोस, श्यामल चक्रवर्ती, बुद्धदेब भट्टाचार्जी जैसे बड़े कम्युनिस्ट सभी बंगाल प्रोविंशियल स्टुडेंट फेडरेशन और फिर बाद में एसऍफ़आयी से आये थे

अगर केरल को ‘भारत की राजनीतिक प्रयोगशाला’ जाता है तो वही राममनोहर लोहिया ने छात्रसंघों को ‘लोकतंत्र की प्रयोगशाला” बताया है, इन्ही छात्र संघो में शुमार जेएनयू छात्रसंघ में   नवनिर्वाचित अध्यक्ष सुचेता डे   ने  विचारधारा के केंद्र जेएनयू में लाल पताका फहरा कर  वाम की प्रासंगिकता को पुनः परिभाषित किया है.हालांकि इस नयी क्रान्ति का सबपर उतना असर नहीं है युवा प्रतिभावान पत्रकार हरिशंकर शाही मानते है की “वामपंथ की यह लाल बहार जाने क्यों केवल बुद्धिजीवता के केन्द्रों में ही दिखती है. असल जिंदगी में हिस्सों में वामपंथ भूखों को भी नहीं भाती है”.अब देखना ये है की सुचेता डे किसकी राह पकड़ती है महिला छात्र राजनीति की पुरोधा  या फिर.......................


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गुरुवार, 1 मार्च 2012

शहरयार ज्ञानपीठ पुरस्कार पानेवाले उर्दू के चौथे शायर रहे.


  मशहूर उर्दू शायर का सोमवार को अपने निजी आवास पर निधन हो गया। 76 वर्षीय शहरयार लंबे समय से बीमार चल रहे थे और ब्रेन ट्यूमर के शिकार थे. अलीगढ़ स्थित अपने निवास पर रात आठ बजे उन्होंने अंतिम सांसें लीं. शहरयार के निधन की जानकारी मिलते ही समूचे साहित्य जगत में शोक छा गया। उन्हें मंगलवार को अलीगढ़ में ही सुपुर्दे खाक किया गया।   
शहरयार पेशे से प्राध्यापक शहरयार को वर्ष 1981 में बनी फिल्म 'उमराव जान' के गीतों की रचना से नई पहचान मिली थी। वह ज्ञानपीठ सहित कई पुरस्कारों से नवाजे गए थे। शहरयार ज्ञानपीठ पुरस्कार पानेवाले उर्दू के चौथे शायर रहे.
शहरयार का मूल नाम कुंवर अखलाक मुहम्मद खान है, लेकिन उन्हें उनके तखल्लुस यानी उपनाम 'शहरयार' से ही पहचाना जाता रहा। उनकी प्रारंभिक शिक्षा हरदोई में हुई थी। 1961 में उर्दू में स्नातकोत्तर की डिग्री लेने के बाद उन्होंने 1966 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उर्दू के व्याख्याता के तौर पर काम शुरू किया था। वह यहीं से उर्दू विभाग के अध्यक्ष के तौर पर सेवानिवृत्त भी हुए।
शहरयार ने हिंदी फिल्म 'गमन', 'अंजुमन' और 'आहिस्ता-आहिस्ता' के लिए भी गीत लिखे थे, लेकिन उन्हें सबसे ज्यादा लोकप्रियता 'उमराव जान' के गीतों से मिली।
वर्ष 2008 के लिए 44वें ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजे गए शहरयार का जन्म 16 जून 1936 में बरेली के आंवला में हुआ था। उर्दू साहित्य जगत में एक विद्वान शायर के तौर पर उनकी अलग ही पहचान थी। अपनी रचनाओं में वह आधुनिक युग की समस्याओं पर रोशनी डालते रहे।
यह शहरयार की कामयाबी ही मानी जाएगी कि उनके लिखे गीत 'इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं', 'जुस्तजू जिसकी थी उसको तो न पाया हमने', 'दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिए' आम लोगों की जुबान पर चढ़ गए। शहरयार को 1987 में उनकी रचना ''ख़्वाब के दर बंद हैं'' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला था. शहरयार ने बेहद ख़ुशी जताते हुए विनम्रता से कहा था कि उन्हें कभी-कभी हैरानी होती है कि बिना ज़्यादा प्रयत्न किए इतने बड़े-बड़े सम्मान कैसे मिल गए.
शहरयार का जन्म उस समय हुआ था जब भारत में प्रगतिशील आंदोलन की शुरुआत हुई, 1936 से लेकर वर्तमान समय तक उर्दू शायरी ने देश की बदलती परिस्थितियों को साहित्य में अभिव्यक्ति दी है जिसमें शहरयार की क़लम का भी अहम योगदान रहा है. देश, समाज, सियासत, प्रेम, दर्शन - इन सभी को अपनी शायरी का विषय बनाने वाले शहरयार बीसवीं सदी में उर्दू के विकास और उसके विभिन्न पड़ावों के साक्षी रहे हैं.  आमतौर पर उर्दू शायरी को मुशायरों से जोड़कर देखा जाता है लेकिन शहरयार इसे ठीक नहीं मानते.उनका कहना था कि देश और दुनिया में जो बदलाव हुए हैं वो सब किसी न किसी रूप में उर्दू शायरी में अभिव्यक्त हुए हैं और वो उनकी शायरी में भी नज़र आता है.
शहरयार की शायरी न तो परचम की तरह लहराती है और न ही कोई एलान करती है वो तो बस बेहद सहजता से बड़ी से बड़ी बात कह जाती है. शहरयार ने मुश्किल से मुश्किल बात को आसान उर्दू में बयां किया क्योंकि वो मानते थे कि जो बात वो कहना चाहते हैं वो पढ़नेवाले तक सरलता से पहुंचनी चाहिए
शहरयार ने भारतीय सियासत और उसके चरित्र को बख़ूबी समझा. अपनी एक ग़ज़ल में वो कहते हैं -तुम्हारे शहर में कुछ भी हुआ नहीं है क्या
कि तुमने चीख़ों को सचमुच सुना नहीं है क्या
 
तमाम ख़ल्क़े ख़ुदा इस जगह रुके क्यों
यहां से आगे कोई रास्ता नहीं है क्या
लहू लुहान सभी कर रहे हैं सूरज को
किसी को ख़ौफ़ यहां रात का नहीं है क्या
शहरयार इन पंक्तियों के माध्यम से ये कहना चाहते हैं कि लोग या तो सियासी चालों को समझ नहीं पा रहे या फिर समझकर भी अनजान बने हुए हैं. अगर ऐसा है तो ये बेहद ख़तरनाक बात है.शहरयार ने उमराव जान, गमन, अंजुमन जैसी फ़िल्मों के गीत लिखे जो बेहद लोकप्रिय हुए. हालांकि वो ख़ुद को फ़िल्मी शायर नहीं मानते.उनका कहना था कि अपने दोस्त मुज़फ़्फ़र अली के ख़ास निवेदन पर उन्होंने फ़िल्मों के लिए गाने लिखे हैं. शहरयार मानते रहे हैं कि बाज़ार के दबाव के बावजूद हिंदी और उर्दू जैसी भारतीय भाषाओं का भविष्य बहुत उज्ज्वल है.
उर्दू शायरी को नए मुकाम तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाने वाले शहरयार को उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, दिल्ली उर्दू पुरस्कार और फिराक सम्मान सहित कई पुरस्कारों से नवाजा गया।
उनकी प्रमुख कृतियों में 'इस्म-ए-आजम', 'ख्वाब का दर बंद है', 'शाम होने वाली है' तथा 'मिलता रहूंगा ख्वाब में' शामिल हैं। वह अच्छे हॉकी खिलाड़ी और एथलीट भी थे।