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सोमवार, 3 अप्रैल 2017

सेक्यूलरिज्म का बोझा अकेले मुसलमान क्यों ढोए, कथित सामाजिक न्याय के जातिगत जनाधारों को अपने अधिकारों की बात करने वाला यह ‘नया मुसलमान’ हजम नहीं हो रहा

                                                                                                       शाहनवाज आलम
उत्तर प्रदेश चुनाव में भाजपा की लगभग एकतरफा जीत और योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद मुसलमानों पर दो नजरियों से बात हो रही है। पहला नजरिया हिंदुत्ववादी है, जिसकी अभिव्यक्ति आप वास्तविक और वर्चुअल दुनिया में मुसलमानों के खिलाफ मुखर होती हिंसक आवाजों में देख सकते हैं। तो वहीं दूसरा नजरिया इस परिणाम के बाद मुसलमानों के लोकतांत्रिक इदारों में बिल्कुल हाशिए पर पहुंच जाने से चिंतित है। जो उसके मुताबिक लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है।
इस तरह इन दोनों विश्लेषणों में मुसलमानों की निरीहिता ही केंद्रीय बिंदु है। लेकिन चूंकि ये दोनों ही विश्लेषण बाहरी नजरिए पर आधारित हैं इसलिए इनमें सच्चाई पूरी तरह नुमायां नहीं है। इसके उलट, उनके अंदर ऐसा बहुत कुछ नया और उत्साहवर्धक घट रह है जिनसे उनमें नई उम्मीदें पैदा होती हैं।
दरअसल मुसलमानों के लिए यह जनादेश बदलते सामाजिक समीकरणों के लिहाज से बिल्कुल ही आश्चर्य में डालने वाला नहीं है। क्योंकि उसे 2014 के लोकसभा चुनाव से काफी पहले से सपा और बसपा के कथित हिंदू सेक्यूलर मतदाताओं के अंदर चल रहे मुस्लिम विरोधी गोलबंदी का अंदाजा था।
मसलन, 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले हुए मुजफ्फरनगर साम्प्रदायिक हिंसा में उसे सपा और बसपा के मूल जनाधारों में उस हिंसा को जायज ठहराने या उसे स्वाभाविक हिंदू प्रतिक्रिया के बतौर देखने या फैजाबाद में यादवों द्वारा मुसलमानों के खिलाफ दशहरा के दिन किए गए हमलों से अंदाजा हो गया था कि आने वाले चुनावों में यह तबका भाजपा के साथ जा सकता है। हालांकि इन जातियों में यह कोई नया रूझान नहीं था, पहले भी ऐसा होता रहा है। लेकिन तब मुसलमान खुलकर सपा और बसपा के जनाधारों के खिलाफ शिकायती मुद्रा में नहीं होता था। उसकी कोशिश होती थी कि वह इन सवालों पर चुप रह कर उन्हें भाजपा के पक्ष में जाने से रोके या उन्हें न्यूट्रल बनाए रखने के लिए खामोश रहे।
लेकिन अगर हम पिछले 10 सालों के मुस्लिम समाज के अंदरूनी जिंदगी में झांकें तो हम पाएंगे कि 2007 से ही बसपा सरकार में आतंकवाद के नाम पर मुसलमानों की धड़पकड़ से उसके अंदर अपने साथ होने वाली नाइंसाफियों पर किसी रणनीतिक कारण से प्रतिक्रिया नहीं देने और चुप रह जाने की प्रवृत्ति में बदलाव आना शुरू हो गया था। इस बदलाव का केंद्रीय विचार अपने साथ होने वाली नाइंसाफी के अलावा इंसाफ के लिए दूसरों का मुंह ताकने के बजाए खुद आवाज उठाना भी था।
यह कोई सामान्य बदलाव नहीं था। बल्कि 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद मुलायम सिंह और मायावती जैसे नेताओं द्वारा उनके अंदर बैठा दी गई इस धारणा को तोड़ने की कोशिश इसमें निहित थी कि इन पार्टियों की निगहबानी में वो सुरक्षित हैं और उन्हें खुद राजनीति में आने की कोई जरूरत नहीं है।
यहां यह भी गौरतलब है कि इस नसीहत को मानकर लगभग पूरी तरह गैरसियासी हो चुकी एक पीढ़ी जिसने मुलायम सिंह यादव को ‘मौलाना’ की उपमा दी थी, अब नई पीढ़ी को सपा-बसपा के साथ खड़े रहने का कोई मजबूत तर्क नहीं दे पा रही थी।
यह नई पीढ़ी कथित सामाजिक न्याय में अपने प्रतिनिधित्व पर सवाल उठा रही थी और यह भी पूछ रही थी कि सेक्यूलरिज्म का बोझा वही अकेले क्यों ढोए। इस तरह उसमें एक नया सियासी वर्ग निर्मित हुआ है जो ‘रिस्क’ लेना सीख रहा है।
इस तरह यह ‘नया मुसलमान’ धर्मनिपेक्षता की नई और बड़ी लकीर खींचने की प्रक्रिया में था और कथित सेक्यूलर राजनीति के पुराने मानकों- मदरसों को वित्तिय सहायता, हज सब्सिडी या उर्दू अनुवादकों की भर्ती, को खारिज कर अपनी शर्तों को मजबूती से रख रहा था। जिसको नजरअंदाज करना आसान नहीं था। मसलन, मायावती ने आतंकवाद के नाम पर गिरफ्तार दिखाए जा रहे दो युवकों के सवाल पर मुसलमानों के आंदोलन के दबाव में जस्टिस निमेष जांच आयोग का गठन किया। ऐसा देश में पहली बार हुआ था। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद पहली बार मुसलमान किसी राजनीतिक मुद्दे पर और वो भी एक कथित सेक्यूलर पार्टी के खिलाफ आंदोलन कर रहा था। इस बदलाव को सपा ने भी भांपा और इस ‘नए मुसलमान’ मतदाता वर्ग को रिझाने के लिए उसने आतंकवाद के नाम पर फंसाए गए मुस्लिम युवकों को रिहा करने, बरी हुए युवकों का पुनर्वास और मुआवजा देने, मुसलमानों में आत्मविश्वास जगाने के लिए राज्य की सुरक्षा बलों में भर्ती के बाबत मुस्लिम बहुत इलाकों में विशेष भर्ती कैम्प लगाने जैसे चुनावी वादे किए।
कहने की जरूरत नहीं कि इनमें से एक भी वादा उसने पूरा नहीं किया, लेकिन मुसलमानों के लिए यह कोई कम बड़ी उपलब्धि नहीं थी। इससे पहले किसी भी राज्य में मुसलमानों के वोट पर राजनीति करने वाली किसी पार्टी को ऐसे वादे करने पर वह कभी मजबूर नहीं कर पाया था।
वहीं दूसरी ओर इस ‘नए मुसलमान’ के उदय से परम्परागत ‘सेक्यूलर’ राजनीति के अपने मूल जातिगत जनाधार में भी इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप बदलाव आने शुरू हो चुके थे। चूंकि सपा और बसपा ने अपने जातिगत आधारों को मुसलमानों से वोट और नोट लेना तो सिखा दिया था, उनके सवालों पर उन्हें संवेदनशील बनाने या उनके धर्मरिरपेक्षीकरण की कोई प्रक्रिया नहीं चलाई थी। इसलिए मुसलमानों को निरीहता की स्थिति में देखने की उसे आदत हो गई थी। उसे निरीह मुसलमान ही अच्छे लगते थे।
कथित सामाजिक न्याय के जातिगत जनाधारों को अपने अधिकारों की बात करने वाला यह ‘नया मुसलमान’ हजम नहीं हो रहा था। लिहाजा, यही वह समय था जब संघ परिवार और भाजपा के साथ उसका गुप्त चुनावी समझौता हुआ। ‘गुप्त’ इसलिए कि उसने 2014 के लोकसभा चुनाव में मुसलमानों को इसकी भनक नहीं लगने दी। वहीं इस ‘नए मुसलमान’ ने इन 10 सालों में सपा और बसपा के साम्प्रदायिक रवैये के चलते भविष्य की योजनाओं के तहत अपनी सामाजिक और राजनीतिक लीडरशिप खड़ी करने का इरादा भी बनाना शुरू कर दिया था। जिसके तहत सामाजिक तौर पर रिहाई मंच, सियासी तौर पर उलेमा काउंसिल, पीस पार्टी खड़ी हुई जिसमें पहले से चली आ रही नेलोपा की लीडरशिप की अक्सरियत थी। वहीं बाद में ओवैसी की एमआईएम भी आई।
यहां यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा कि जहां पहले ऐसी किसी भी पार्टी को मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा सपा-बसपा के प्रभाव में भाजपा का एजेंट कह कर खारिज कर देता था, वहीं इस दरम्यान हुए चुनावों में उसने भले इन्हें जीतने लायक वोट न दिया हो लेकिन ऐसे किसी भी तर्क को एक सिरे से नकार दिया। यहां तक कि इस बार भाजपा की प्रचंड जीत के बावजूद मुसलमानों में अपने वोटों के बंट जाने का अपराधबोध बिल्कुल गायब है, जैसा कि ऐसी स्थितियों में पहले होता रहा है। उल्टे इस बार वो सपा और बसपा के हिंदू जनाधार के बंटवारे को भाजपा की जीत का जिम्मेदार मान रहा है। राजनीतिक तौर पर जड़ और नई बहसों और प्रयोगों से बचने वाले इस समाज में आया यह एक अहम बदलाव है।
वहीं अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो रहे इस ‘नए मुसलमान’ को सत्तारूढ़ सपा ने कैसे सम्बोधित किया यह समझना कथित सेक्यूलर राजनीति के हिंदुत्ववादी चरित्र को समझने के लिए अहम होगा। सपा ने अपने घोषणापत्र से इन सभी मुद्दों को ही गायब कर दिया। इस तरह उसने अपने हिंदू जातिगत जनाधार को यह संदेश देने की कोषिष की कि वो उसे मुस्लिम हितैषी समझने की गलती ना करे, उस पर भरोसा करे वो अपनी गलती सुधारने को तैयार है। वहीं दूसरी ओर इससे उसने मुसलमानों में विकसित हो रही राजनीतिक चेतना को ही पलट देने की कोषिष की।
जाहिर है, अखिलेश यादव ने ऐसा इसलिए किया कि यह चेतना उनकी सेक्यूलरिज्म की जड़ और यथास्थितिवादी राजनीति को चुनौती दे रही थी। यह ज्यादा सवाल पूछने वाला ‘नया मुसलमान’ ज्यादा प्याज खाने वालों से खतरनाक था।
वहीं इस ‘नए मुसलमान’ में एक और सुखद बदलाव यह दिखा कि उसने मुजफ्फरनगर हिंसा के जिम्मेदार जाटों को बिल्कुल ही वोट नहीं दिया। जबकि अजित सिंह को यह उम्मीद थी कि मुसलमान फिर से जाटों को वोट दे देंगे। यह निर्णय सुखद इसलिए है कि कम से कम मुसलमान एक सामान्य मानवीय प्रवृत्ति का प्रदर्शन कर पाया जिसके तहत कोई इंसान अपने हत्यारों या जालिम के साथ नहीं खड़ा होता। यानी सामने वाले के अपनी सुविधानुसार सेक्यूलर और कम्यूनल होने के परम्परागत एकाधिकार को मुसलमानों ने खारिज कर दिया।
यानी उसने भाजपा को रोकने के नाम पर अपनी मानवीय गरिमा से समझौता नहीं किया। अपनी गरिमा और स्वायत्ता को हर हाल में बचाए रखने की जिद ही लोकतंत्र में नई सम्भावनाओं को जन्म देती है। 2017 का मुसलमान, इन सम्भावनाओं से भरपूर है जो भविष्य की किसी भी सेक्यूलर राजनीति को अब वास्तव में पहले से ज्यादा सेक्यूलर होने पर मजबूर करेगा। मुसलमानों के लिए यह कोई मामूली उपलब्धि नहीं है।
 (स्वतंत्र लेखक, डाॅक्यूमेंट्री फिल्मकार, और राजनीतिक कार्यकर्ता)
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शनिवार, 1 अप्रैल 2017

ये उस भारत की हार है जो गांधी को नहीं मारता

                                                                                       
                                                शाहनवाज आलम
भारत जैसे किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी राजनीतिज्ञ का ‘फायर ब्रांड’ जैसी उपमा से सम्बोधित किया जाना जितना सामान्य नजरिए से स्वीकृत किया जाता है वह उतना ही एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के बतौर हमारी असामान्य कमजोरी को जाहिर करता है। मसलन, जब हम योगी आदित्यनाथ या उन जैसे राजनीतिज्ञ को ‘फायर ब्रांड’ मान लेते हैं तो इससे यही जाहिर होता है कि हमारी न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्था उनके संविधान विरोधी भाषणों को या तो नजरअंदाज करके उनके हौसले को बढ़ाती है या वे ऐसी किसी गतिविधि को अंजाम देकर भी बहुत आसानी से कानून के शिंकजे से बच जाने की महारत  रखते हैं। इसलिए किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में ‘फायर ब्रांड’ नेता का उत्पन्न होना उसकी अपनी व्यक्तिगत उपलब्धि से कहीं ज्यादा तंत्र की स्वैच्छिक विकलांगता को दर्शाता है। वहीं ऐसे किसी भी राजनीतिज्ञ का लोकप्रिय होना और लगातार चुनाव जीतना यह भी साबित करता है कि हमारा निर्णायक बहुमत संविधान विरोधियों से कितना प्रेम करता है। इसीलिए एक डाक्यूमेंट्री फिल्मकार के बतौर जिसने योगी आदित्यनाथ को लम्बे समय तक फाॅलो किया है और उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाहियों का हिस्सा रहा है, मेरे लिए ‘फायर ब्रांड’ योगी आदित्यनाथ का मुख्यमंत्री बन जाना, भाजपा और संघ की उपलब्धि से कहीं ज्यादा उनको संरक्षण देने वाले विपक्षी दलों और उन्हें ‘वाॅक ओवर’ देने वाली न्यायपालिका की उपलब्धि है।
मसलन, मेरी फिल्म ‘सेेफ्ररन वाॅर ए वाॅर अगेंस्ट नेशन’ में शामिल योगी आदित्यनाथ के आजमगढ़ में 2008 में दिए गए भाषण जिसमें वो एक के बदले 10 लोगों की हत्या का आह्वान कर रहे हैं, का एक हिस्सा तीन दिनों के अंदर 3 लाख लोगों ने देखा है। उनका यह भाषण पहले भी मीडिया में बहस का विषय बनता रहा है। लेकिन यह जानना हमारे तंत्र की स्वैच्छिक विकलांगता को साबित करने के लिए क्या काफी नहीं होगा कि फिल्म के निर्माताओं शाहनवाज आलम, राजीव यादव और लक्ष्मण प्रसाद द्वारा जब 20 मार्च 2009 को मुख्य चुनाव आयुक्त, भारत निर्वाचन आयोग व 23 मार्च 2009 को मुख्य निर्वाचन अधिकारी उत्तर प्रदेश को भाषण की मूल रिकार्डिंग की सीडी समेत प्रार्थना पत्र प्रेषित कर उनसे आदित्यनाथ व रमाकांत यादव के विरुद्ध धारा 125 रिप्रेजेन्टेशन आॅफ पिपुल्स एक्ट 1951 एवं अन्य विधिक प्राविधानों के अन्तर्गत एफआईआर दर्ज कराने की मांग की गई तो दूसरी तरफ सेे कोई रिस्पांस ही नहीं मिला। जिसके बाद हम लोगों ने मामले को इलाहाबाद हाई कोर्ट के समक्ष रखा। तब योगी आदित्यनाथ जिस वीडियो को कई अवसरों पर अपना मान चुके हैं, उस पर तत्कालीन अपर पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण) आजमगढ ने 16 अपै्रल 2009 को अपना पक्ष रखते हुए ऐसे किसी आपत्तिजनक भाषण के दिए जाने से ही इंकार कर दिया। इतना ही नहीं उल्टे उन्होंने भाषण के सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ने एवं आपराधिक श्रेणी में न आने व आवेदकों द्वारा बढ़ा-चढ़ाकर मनगढ़ंत साक्ष्य तैयार किए जाने की बात कहते हुए आवेदन पत्र को झूठा व निराधार बता दिया। वहीं यह भी जानना महत्वपूर्ण होगा कि इसी भाषण में योगी आदित्यनाथ ने हाईकोर्ट के हवाले से इस झूठे तथ्य को भी प्रसारित किया था कि उसने अपने एक फैसले में राज्य सरकर से यह पूछा है कि हिंदू लड़कियां ही मुस्लिम लकड़ों के साथ क्यों भागती हैं। इस तरह उन्हांेने हाईकोर्ट के झूठे उद्धरण के जरिए मुसलमान महिलाओं के साथ यौनिक हिंसा को जायज ठहराने का प्रयास किया। लेकिन, अदालत ने इस भाषण की सीडी और उनके भाषण के ट्रांस्कृप्ट मुहैया कराने के बावजूद इस पर किसी तरह की कोई कार्रवाई नहीं की। जब की यह खुद न्यायपालिका के अपमान का मजबूत उदाहरण था।
यानी उनकेे जिस भाषण पर लोग उनकी आलोचना कर रहे हैं या जिसे वे खुद वाजिब ठहरा चुके हैं उस भाषण के अस्त्तिव को ही प्रशासन नकार चुका है। यहां यह याद रखना जरूरी होगा कि ऐसे अपराध में  3 साल से लेकर उम्र कैद तक की सजा का प्रावधान है।
जाहिर है किसी के ‘फायर ब्रांड’ नेता बनने में उसकी वाकपटुता या विभाजक शब्दों और मुहावरों के उसके चुनाव की क्षमता से कहीं ज्यादा श्रेय ऐसी भाषा पर अंकुश लगाने के लिए जिम्मेदार तंत्र की आपराधिक भूमिका को जाता है।
इसी तरह, अगर हम उनके खिलाफ दायर मुकदमों की नवईयत को देखें तो ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे। मसलन, 27 जनवरी 2007 की रात गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर योगी आदित्यनाथ ने विधायक राधामोहन दास अग्रवाल और गोरखपुर की मेयर अंजू चैधरी की मौजूदगी में हिंसा फैलाने वाला भाषण देते हुए ऐलान किया कि वो ताजिया नहीं उठने देंगे और खून की होली खेलेंगे। जिसके लिए उन्होंने आस-पास के जिलों में भी अपने लोगों को कह दिया है। इस भाषण के बाद भीड़ ‘कटुए काटे जाएंगे, राम राम चिल्लाएंगे’ के नारों के साथ मुसलमानों की दुकानंे फंूकती आगे बढ़ती चली गई। इसके बाद गोरखपुर, देवरिया, पडरौना, महाराजगंज, बस्ती, संत कबीरनगर और सिद्धार्थनगर में योगी के कहे अनुसार ही मुस्लिम विरोधी हिंसा हुई। लेकिन इस पूरे प्रकरण जिसमें मुसलमानों की करोड़ों की सम्पत्ति का नुकसान हुआ उसमें मायावती सरकार में पुलिस अधीक्षक से एफआईआर दर्ज करने का प्रार्थना पत्र बेमानी साबित हुआ। जिसके बाद सामाजिक कार्यकर्ताओं परवेज परवाज और असद हयात द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट में रिट पेटिशन दायर कर प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की गई लेकिन अदालत ने उसे खारिज करते हुए सेक्षन 156 (3) के तहत कार्रवाई का निर्देश दिया। जिसके बाद सीजेएम गोरखपुर की कोर्ट में एफआईआर दर्ज कराने के लिए गुहार लगाई गई। जिस पर कुल 10 महीने तक सुनवाई चली और अंततः मांग को खारिज कर दिया गया। जिसके खिलाफ फिर हाईकोर्ट में रिवीजन दाखिल हुआ। तब जाकर इस मामले में एफआईआर दर्ज हो पायी। यहां यह जानना रोचक होगा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने अपनी आत्मकथा ‘मेरे बहुजन संघर्ष का सफरनामा’ के भाग 1 में लिखा है कि उन्होंने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को पत्र लिख कर कहा था कि योगी आदित्यनाथ की गतिविधियां राष्ट्रविरोधी हैं जिस पर रोक लगनी चाहिए। जाहिर है मायावती अपनी आत्मकथा में तो यह लिख सकती थीं लेकिन उनके राज में योगी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के लिए किसी को भी कम से कम दो बार हाईकोर्ट जाना पड़ता था।
वहीं इस एफआईआर के दर्ज होने के बाद योगी के साथ सहअभियुक्त अंजू चैधरी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर एफआईआर और जांच पर स्टे ले लिया। जिसके बाद 13 दिसम्बर 2012 को सुप्रीम कोर्ट ने अंजू चैधरी की एसएलपी को खारिज कर दिया और जांच के आदेश दे दिए। लेकिन सीबीसीआईडी की इस जांच के लिए अखिलेश यादव सरकार ने अपने जांच अधिकारी को अनुमति ही नहीं दी और मामला वहीं का वहीं पड़ा रहा। यहां 2007 में पडरौना शहर और रजानगर में हुई मुस्लिम विरोधी हिंसा का उदाहरण भी देखा जाना चाहिए जिसमें मुसलमान दुकानदारों की गुमटियों को न सिर्फ पूरी तरह जला दिया गया बल्कि उनकी जगह रातों रात हिंदू दुकानदारों को बैठा दिया गया और इसे तत्कालीन मुलायम सिंह सरकार ने साम्प्रदायिक हिंसा तक मानने से इंकार कर दिया। जाहिर है, योगी आदित्यनाथ को बसपा और सपा दोनों ही सरकारों ने संरक्षित किया।
दरअसल, योगी कोई अचानक प्रकट हुए राजनीतिज्ञ नहीं हैं जैसा कि मीडिया और लिबरल बुद्धिजीवी तबका समझ रहा है। वह अपने आप में एक पूरा तंत्र हैं जो लम्बे समय से काम कर रहे है और जिनके पास अपनी सेना, न्यायतंत्र, मीडिया और अपना प्रषासनिक अमला है, या उनके लोग इन अमलों में शामिल हैं। जो सिर्फ और सिर्फ योगी के प्रति निष्ठावान है। इसीलिए जब गोरखनाथ मंदिर से हमने ‘योगी जी की सेना चली’ नाम की सीडी खरीदी और उसके एक गाने को आपत्तिजनक बताते हुए एक वामपंथी नेता ने जब गोरखपुर में प्रेस कांफ्रेंस किया तब चंद मिनटों के अंदर ही न सिर्फ वो सीडी मार्केट से गायब हो गई बल्कि हमें भी जितना जल्दी हो शहर से निकल जाने का सुझाव दिया जाने लगा। गौरतलब है कि इस एल्बम के एक गाने जिसका इस्तेमाल हमने अपनी फिल्म में भी किया है में देवरिया के मोहन मुंडेरा कांड जिसमें 76 मुसलमानों के घर मस्जिद में लगे माईक को निकाल कर दिए गए योगी के भाषण के बाद हिंदू युवा वाहिनी के कार्यकताओं ने जला दिया था, का श्रेय लिया गया था। जबकि कोर्ट में हिंदू युवा वाहिनी इस घटना में अपनी संलिप्तता से इंकार करती रही है। गीत के बोल थे ‘घेर के मारल गइलें विधर्मी घरवा गईल फुंंकाए ,,,युवा वाहिनी के सपना साकार हो जाई’।
इसीलिए जब लोगों ने योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनने पर बधाई दी तो मुझे उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज न करने वाले पुलिस अधिकारियों, जांच अधिकारियों, उन्हें बचाने वाले जजों, उनके खिलाफ खबरों को छुपाने वाले पत्रकारों, गैरभाजपाई मुख्यमंत्रियों मुलायम सिंह यादव, मायावती और अखिलेश यादव सब के प्र्रति नाइंसाफी पर बहुत दया आई। आखिर योगी की सफलता में इनके योगदान को क्यों भुला दिया गया? इन्हें क्यों नहीं बधाई दी गई?
दरअसल, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि योगी आदित्यनाथ एक ऐसी राजनीतिक और सांस्कृतिक परिघटना की उपज हैं जो भारतीय राष्ट्र राज्य के साथ-साथ ही विकसित हुआ है और अपने मूल में हर उस मूल्य का सिर्फ प्रतिलोम ही नहीं रहा है जिसका दावा भारतीय राज्य औपचारिक तौर पर करता है बल्कि उसके घोषित मान्यताओं को नकारने और उसके महान लक्ष्यों को बदल देने के लिए हमेशा तत्पर भी रहता रहा है। सबसे अहम कि यह परिघटना इतनी स्वाभाविक मान ली गई है कि इसे कहीं से भी नुकसानदायक तो दूर असामान्य तक मानने को लोग तैयार नहीं हैं। इसीलिए किसी सामान्य व्यक्ति के लिए जिस तरह योगी का एक ‘फायरब्रांड’ नेता होना स्वीकार्य है उसी तरह उसके लिए यह जानकारी भी परेशान करने वाली नहीं है कि गांधी जी की हत्या में गोरखनाथ पीठ की ही रिवाल्वर का इस्तेमाल हुआ बताया जाता है या खुद दिग्विजय नाथ गांधी जी की हत्या के आरोप में जेल जा चुके हैं या बाबरी मस्जिद में रात के अंधेरे में राम की मूर्तियां रखने के एक आरोपी दिग्विजय नाथ भी थे। इसीलिए भारतीय राष्ट्र राज्य के अस्त्तिव में आते ही भारत के वर्तमान और भविष्य को प्रभावित करने वाली जो दो नियामक घटनाएं हुईं- महात्मा गांधी की हत्या और बाबरी मस्जिद में मूतियों का रखा जाना, उसके आरोपी भौतिक केंद्र के सर्वेसर्वा का सबसे बड़े राज्य का मुख्यमंत्री बन जाने का एक स्पष्ट अर्थ है। यह उस भारत की हार है जो महात्मा गांधी की हत्या नहीं करता या जो बाबरी मस्जिद में रात के अंधेरे में मूर्ति नहीं रखता। इसीलिए योगी के ‘हेट स्पीच’ के समर्थकों को उन भाषणों में एक नए भारत के निमार्ण का संकल्प दिखता है। वही संकल्प जो गोडसे ने गांधी पर गोली चलाने से पहले या 1949 की 22-23 दिसम्बर की रात को बाबरी मस्जिद में मूर्ति रखते हुए लोगों ने लिया होगा।
इसीलिए, सिद्धार्थनगर में ‘हिंदू चेतना रैली’ को सम्बोधित करते हुए हिंदू युवा वाहिनी के एक बड़े नेता ने जब योगी और महिला नेताओं की उपस्थिति में मंच से मुस्लिम महिलाओं के कंकालों को कब्रिस्तानों से निकाल कर उनके साथ बलात्कार करने का आह्वान किया या जब उनके एक नेता ने मुसलमानों से वोट देने का अधिकार छीन लेने की बात की तब वहां मौजूद भीड़, मीडिया और पुलिसकर्मियों का उत्साह  देखकर मुझे ऐसा कभी नहीं लगा कि मैं कुछ नया देख रहा हूं। उन्हें देखकर यही महसूस हुआ कि ये बात वो शायद बहुत दिनों से कहना चाहते थे लेकिन किसी दबाव में वे ऐसा नहीं कह पा रहे थे। मेरी फिल्म के एक विजूअल में इस भाषण पर एक पुलिसकर्मी का माथे पर भगवा पट्टा लपेटे और हाथ में फरसा लिए हिंदू युवा वाहिनी के कार्यकर्ता मंे रूपांतरित होना कहीं से भी अस्वाभाविक नहीं लगता। यही इस रूपातंरण का सबसे खतरनाक पहलू है। हां, यहां मुझे उस समान जेहनियत वाली भीड़ में उस असामान्य आदमी की जरूर याद आती है जिसने सिद्धार्थनगर की उस सभा में अपने हम उम्र बच्चों के साथ दौड़ भाग करते 8-10 साल के लड़के को उसके मुस्लिम होने की वजह से वहां से भगाने का विरोध करते हुए अपने एक योगी भक्त कार्यकर्ता से ऐसा नहीं करने को कहा था कि ‘लईका ह खेले द’। मैं उसके बारे में अक्सर सोचता हूं कि क्या वह अब भी ‘अपने’ को बचा पाया होगा या औरों की तरह हो गया होगा ?
इसीलिए जब 2 अप्रैल को इलाहाबाद हाईकोर्ट परिसर में इलाहाबाद हाईकोर्ट के कार्यक्रम में बतौर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट के माननीय न्यायधीशों के साथ पूरे सूबे भर के जजों के सामने बैठेंगे तो उसे भी शायद एक सामान्य घटना ही माना जाए और  शायद जजों का एक बड़ा हिस्सा उनके पैर छू कर उनसे आर्शिवाद भी ले जैसा कि गोरखपुर में अधिकतर सरकारी नौकरों को करने में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगता। उन्हंे इससे शायद ही फर्क पड़े कि योगी आदित्यनाथ के खिलाफ कई मामलों में उन्हें जल्दी ही फैसला भी सुनाना है और आरोपी के साथ सार्वजनिक या गुप्त तौर पर नजर आना नैतिक तौर पर गलत है।
लेकिन जब ऐसा हो रहा होगा तब मुझे अपने एक पत्रकार दोस्त के दिवंगत पिता की याद बार-बार आएगी। जो आजमगढ़ में जज थे और जिनकी मृत्यु कोर्ट परिसर में आए हार्ट अटैक से इसलिए नहीं टल सकी  कि उन्होंने एक वकील की अपने स्कूटर से अस्पताल छोड़ देने की पेशकश को मानने से इंकार कर दिया था। उन्हें एक जज का किसी वकील के स्कूटर से अपनी जान बचाने के लिए भी अस्पताल जाना नैतिक तौर पर गलत लगा था।
                           
             (स्वतंत्र लेखक, डाॅक्यूमेंट्री फिल्मकार, और राजनीतिक कार्यकर्ता)
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मंगलवार, 24 जनवरी 2017

राष्ट्रगान विवादः क्या हम अमरीका से नहीं सीख सकते

       
                                                                                शाहनवाज आलम

मलयाली के चर्चित लेखक कमल चवारा को अपने फेसबुक पर कथित तौर पर राष्ट्रगान के अपमान के आरोप में केरल पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए जाने से एक बार फिर सप्रीम कोर्ट का वह फैसला बहस के कंेद्र में आ गया है जिसमें उसने सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले इसे बजाए जाने और सभी का खड़े होना अनिवार्य बताया है। गौरतलब है कि कमल चवारा से पहले भी गोवा मंे एक विकलांग व्यक्ति को सिनेमा घर में लोगों ने राष्ट्र गीत के समय नहीं खड़े होने पर पीटा था और हाल में चेन्नई में एक फिल्म महोत्सव के दौरान भी ऐसे ही आरोप में 6 लोगांे को पुलिस ने गिरफ्तार किया था।

इन घटनाओं मंे एक खास संदर्भ का जिक्र किया जाना जरूरी है कि पुलिस में शिकायत करने वाले लोग एक खास वैचारिक-राजनीतिक समूह से ताल्लुक रखने वाले हैं। मसलन, कमल चवारा के मामले मंे शिकायतकर्ता भाजपा नेता है जिसने चवारा के उस पोस्ट को राष्ट्रविरोधी बताया है जिसमें लेखक ने अपने एक अप्रकाशित उपन्यास के एक हिस्से को फेसबुक पर डाला था। जिसमें एक स्कूल का जिक्र है जहां शिक्षक छात्रों को कक्षा के दौरान शौचालय जाने की इजाजत नहीं देते। दोपहर 4 बजे कक्षा के खत्म होने पर छात्र राष्ट्रगान गाते हैं। ऐसे में छात्रों के लिए राष्ट्रगान का मतलब होता है कि वे अब शौचालय जा सकते हैं। जाहिर है कोई भी विवकेशील और प्राकृतिक जरूरतों से वाकिफ व्यक्ति बच्चों से जुड़े इस घटनाक्रम को कथित राष्ट्रवाद के नजरिए से नहीं देख सकता। अगर वो ऐसा करता है तो उसे या तो बच्चों की प्राकृतिक जरूरतों का ज्ञान नहीं है या फिर वो किसी ऐसी विचारधारा का शिकार है जिसने उसे इंसान छोड़ा ही नहीं है। क्योंकि किसी बच्चे को कभी भी बाथरूम जाने की जरूरत पड़ सकती है और ऐसी स्थिति में अगर उसका शिक्षक उसे पहले राष्ट्रगान गवाए तो बच्चे राष्ट्रगान को अपनी प्राकृतिक जरूरतों के बीच एक बाधा के बतौर ही देखेंगे।

इसलिए इस मुद्दे के बहाने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर बहस होनी चाहिए जिसकी आड़ में राष्ट्रवाद का एक अमानवीय और अस्वाभाविक संस्करण तैयार किया जा रहा है। जाहिर है जिस फैसले का सबसे ज्यादा उपयोग या दुरूपयोग अगर सत्ताधारी पार्टी और उसकी वैचारिकी से जुड़े लोग करते हैं तो उस फैसले को भी एक राजनीतिक और विचारधारात्मक फैसला ही माना जाएगा और इसी नजरिए से उसपर बात भी होनी चाहिए। सवाल यह भी होना चाहिए कि क्या अदालत या किसी जज को इसतरह की छूट दी जा सकती है कि वह अपने ही पुराने फैसलों को बिना जेरे गौर लाए सत्ता के विचारधारा से रंगा फैसला सुनाए। ये सवाल इसलिए भी अहम है कि सुप्रीम कोर्ट ने प्रोफेसर बीज्यू एमेन्यूएल केस में दिए गए अपने ही ऐतिहासिक फैसले को भी संदर्भ में नहीं लिया। जिसका जिक्र पूर्व एटर्नी जनरल सोली सोराबजी ने भी इस फैसले पर आपत्ती जाहिर करते हुए किया है कि जजों ने 1985 के अपने ही फैसले को नजरअंदाज कर दिया जिसमें ऐसे ही मामले में जब तीन बच्चे इसलिए राष्ट्रगान में खड़े नहीं हुए थे क्यांेकि वे जिस जेहावा मजहब को मानते हैं उसमें ईश्वर के अलावा किसी और की वंदना नहीं की जाती। उक्त फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि राष्ट्रगान नहीं गाना राष्ट्रगान का अपमान नहीं है।

इस रोशनी में देखा जाए तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने राष्ट्रवाद के हिंदुत्ववादी परिभाषा पर ही मुहर लगाई है। इसीलिए इस मुद्दे पर समाज विचारधारात्मक आधार पर बंट गया है जो न्यायपालिका की छवि के लिए ठीक नहीं है। क्योंकि जहां इससे देश की बहुलतावादी संस्कृति पर अदालत के उकसावे से हमले बढे़ंगे वहीं सभ्यतागत विकास की धारा भी ठहर जाएगी। जिसके लिए व्यक्तियों और समुदायों में वैचारिक और सांस्कृतिक मतभिन्नता का स्पेस सबसे जरूरी होता है।

दरअसल इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला खुद अपने आप में अस्पष्ट और अंतरविरोधी भी है। मसलन, इसमें कहा गया है कि राष्ट्रगान का किसी भी तरह का व्यावसायिक इस्तेमाल नहीं हो सकता जिससे कोई भी किसी तरह का व्यावसायिक लाभ नहीं उठा सके। जबकि सिनेमा हाॅल अपने आप में एक व्यावसायिक केंद्र होते हैं जिन्हें आर्थिक लाभ के लिए ही संचालित किए जाते हैं। वहीं बदलते समय में राजनीति भी व्यवसाय ही बन गई है जहां राष्ट्र गान और राष्ट्रवाद की सबसे ज्यादा तिजारत की जाती है। वहीं इस फैसले में यह भी कहा गया है कि इसे किसी मनोरंजन कार्यक्रम का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता है, जबकि सिनेमा हाॅल में अधिकतर लोग सिर्फ मनोरंजन के उद्येश्य से ही जाते हैं और सिनेमा हाॅल मनोरंजन कर भी देते हैं। यानी ये फैसला ही अपने आप में न्यायिक भाषा में कहें तो ‘नाॅन ऐप्लिकेशन आॅफ माइंड’ का बनता है और इसमें तार्किक आधार पर फैसले पर पहंुचने के बजाए हठ और हड़बड़ी ज्यादा दिखती है। इसीलिए समाज का एक बड़ा तबका इसे न्यायिक के बजाए राजनीतिक फैसले के बतौर देख रहा है।

दरअसल किसी भी पिछले वक्त से ज्यादा आज यह याद रखने की जरूरत है कि पूरी दुनिया में जितने लोग राष्ट्रवाद नाम के उन्माद में मारे गए हैं उतना किसी और कारण से नहीं मारे गए। किसी को राष्ट्रवाद के नाम पर उत्पीड़ित करना सबसे निकृष्टतम अपराध है जिसमें अपराधी किसी भी अन्य तरह के अपराधों के मुकाबले ज्यादा अतार्किक कारणों से हिंसा करता है। क्योंकि वो जिस आधार पर हिंसा करता है या दंड देता है उसका कोई स्पष्ट और स्थाई स्वरूप नहीं होता, सिर्फ काल्पनिक और मनोगत धारणा होती है। मसलन, भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी जब बटवारे से पहले मौजूदा पाकिस्तान में रहते थे तब उनके लिए भारत माता और राष्ट्रवाद की भौगोलिक सीमा मंे मौजूदा पाकिस्तान से लेकर बांग्लादेश तक सब आता होगा। लेकिन बटवारे और उनके भारत आ जाने के बाद वो संकुचित हो गया। ये परिर्वतन सिर्फ 70 सालों में हुआ है। इसलिए आज से सौ दो सौल बाद भारतीय राष्ट्रवाद की भौगोलिक सीमा क्या होगी ये कोई नहीं जानता। दरअसल, राष्ट्रवाद अपने आप में हिंसक कबीलाई संस्कृति के अवशेष के अलावा कुछ भी नहीं है। जिसकी संचालक शक्ति दूसरे भौगोलिक और जातिय समुदायों से नफरत और उनके अस्तित्व का नकार है। इसीलिए राष्ट्रवाद तार्किक और ठोस धरातल पर कोई बात नहीं करता वो दूसरों के पतन की काल्पनिक कहानियां गढ़ता और सुनाता है। इकबाल का मशहूर तराना ‘सारे जहां से अच्छा’ इसका सबसे अच्छा सुबूत है। जब वो कहते हैं ‘यूनान-ओ-मिस्र-ओ रोमा, सब मिट गए जहां से, अब तक मगर है बाकी नामो-ओ-निशां हमारा’। अब कोई मूर्ख ही होगा जो ये माने कि यूनान, मिस्र और रोम दुनिया से मिट चुके हैं और सिर्फ भारत ही धरती पर एक मात्र देश बचा है। कल्पना करिए कि भारतीय खिलाड़ी दल इन तीनों में से किसी एक देश में हो रहे ओलम्पिक में शामिल होने गया हो और यही तराना हमारा राष्ट्रगान हो। नियम के मुताबिक लाखों स्थानीय दशर्कों से भरे स्टेडियम में हमारा दल अपना राष्ट्रगान गाता और उन्हें बताता कि उनके देश का तो नामोनिशान मिट चुका है, तो इसके क्या परिणाम होते? कोई भी खिलाड़ी वापस सकुशल लौट पाता?

दरअसल हमें ऐसी घटनाओं पर दूसरे देशों के अनुभवों से सीख लेनी चाहिए। मसलन, अश्वेत अमरीकी एथलीट काॅलिन केपरनिक पिछले दिनों राष्ट्रगान के दौरान अश्वेतों पर बढ़ती हिंसा के विरोध स्वरूप खड़े नहीं हुए। जिसपर वहां के कथित श्वेत राष्ट्रवादियों ने हंगामा मचा दिया। लेकिन दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति ओबामा ने यह कह कर पूरी दुनिया के संकिर्णतावादियों को खामोश कर दिया कि वे केपरनिक की भावनाओं का सम्मान करते हैं और ऐसा करके उन्होंने संविधानप्रदत असहमत होने के अधिकार का ही इस्तेमाल किया है। उन्होेंने आगे कहा कि हमारे संविधान, हमारे अभिव्यक्ति के अधिकार के प्रति हम कितने निष्ठावान हैं इसकी परिक्षा तब पास करना ज्यादा जरूरी होता है जब स्थितियां बहुत कठिन हों।

इसलिए अगर एक बेहतर देश बनना है तो न्यायपालिका को संकिर्णता से बचना होगा। उसे जेरे बहस राष्ट्रगान के मुद्दे पर उसके रचईता टैगोर के इन शब्दों को जरूर याद रखना चाहिए कि ‘मेरे देशवासी अपने वास्तविक भारत को तभी प्राप्त कर पाएंगे जब वे उस धारणा से लड़ पाएंगे जो उन्हें सिखाती है कि देश मानवता के आर्दशों से बड़ा होता है।

जनता लेगी हिसाब नागपुर से बनकर आया है सपा का चुनावी घोषणा-पत्र

आतंकवाद के नाम कैद बेगुनाहों की रिहाई का एजेण्डा अब अखिलेश का एजेण्डा नहीं - रिहाई मंच
भाजपा के नक्शे कदम पर अखिलेश, सच्चर-रंगनाथ को मानने लगे हैं मुस्लिम तुष्टीकरण 
चुनावी घोषणा पत्र से गायब कर देने मात्र से सवाल गायब नहीं होंगे
जनता लेगी हिसाब
नागपुर से बनकर आया है सपा का चुनावी घोषणा-पत्र 


लखनऊ 22 जनवरी 2017। रिहाई मंच ने समाजवादी पार्टी के 2017 के चुनावी घोषणा-पत्र में मुसलमानों के मुद्दों से अखिलेश यादव पर पीछे हटने का आरोप लगाया है। मंच ने आतंकवाद के नाम पर बंद बेगुनाहों को छोड़ने व उनके पुर्नवास-मुआवजा, सच्चर-रंगनाथ आयोगों की रिपोर्टों पर सांप्रदायिक जेहनियत के तहत अमल न कर पाने वाले अखिलेश यादव से पूछा हैे कि यह मुद्दे इस बार गायब क्यों है। सिर्फ चुनावी घोषणा-पत्र से गायब कर देने मात्र से सवाल गायब नहीं होंगे जनता चुनावों में इसका हिसाब मांगेगी।  
रिहाई मंच अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब ने कहा कि अखिलेश यादव को यह भ्रम है कि वह आतंकवाद के नाम पर बेगुनाह मौलाना खालिद मुजाहिद, जियाउल हक, दादरी में अखलाक की हत्या, मुजफ्फरनगर, कोसीकलां, फैजाबाद, अस्थान में दंगे करवाते रहेंगे और मुसलमान उन्हें विकास के नाम पर वोट दे देगा। इस घोषणापत्र में अल्पसंख्यकोें की सुरक्षा व धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के वादे पर रिहाई मंच अध्यक्ष ने पूछा कि जब पुलिस की हिरासत में ही मौलाना खालिद मुलाहिद की हत्या कर दी जाती हो और अखिलेश उसको स्वाभाविक मौत बताते हों या अखलाक को घर से खींचकर भाजपा के लोग  मार डालते हों और सरकार हत्यारों को बचाने के लिए सीबीआई जांच नहीं करवाती और हत्यारे को तिरंगे में लपेटा जाता हो, जिनकी सरकार में रघुराज प्रताप सिंह जैसे गुण्डों को मंत्री बनाकर ईमानदार पुलिस अधिकारी जियाउल हक की सरेआम हत्या करवा दी जाती हो वह किस मुंह से मुसलमानों की सुरक्षा की बात कर सकते हैं। पूरी दुनिया ने देखा कि मुजफ्फरनगर में मां-बेटियों की अस्मत लूटी जा रही थी, बच्चे ठंड से मर रहे थे और बाप-बेटा सैफई में नाच करवा रहे थे। मुजफ्फरनगर के पीड़ितों को भिखारी कहने वाले आजम खां को जौहर विश्वविद्यालय के नाम पर सौगात देकर सांप्रदायिक हिंसा पीड़ितों का अखिलेश ने मजाक उड़ाया। संगीत सोम, सुरेश राणा से लेकर पूरे प्रदेश में हुई इस सरकार में रिकार्ड सांप्रदायिक हिंसा में किसी को भी सजा नहीं हुई। 

रिहाई मंच प्रवक्ता शाहनवाज आलम ने कहा कि सपा का यह चुनावी घोषणा पत्र नागपुर से बनकर आया है इसीलिए सांप्रदायिकता के विनाश जैसे सवालों को छापने की हिम्मत भी अखिलेश यादव नहीं कर पाए हैं। उन्होंने कहा कि अखिलेश ने पटना की मोदी की रैली में हुए धमाकों के बाद मिर्जापुर, फतेहपुर से तो वहीं मोदी के लखनऊ आने पर आईएस के नाम पर लखनऊ और कुशीनगर से, अलकायदा के नाम पर संभल जैसे जिलों से मुस्लिम युवकों को सालों जेलों में सड़ाने के लिए केन्द्रिय सुरक्षा एजेंसियों के हवाले कर दिया। कहां तो वादा था बेगुनाहों को रिहा करने का लेकिन जो लोग खुद अदालतों से  8-9 साल बाद बरी हुए उन्हें फिर जेल भिजवाने के लिए सरकार अदालत चली गई। धार्मिक स्वतन्त्रता की बात करने से पहले अखिलेश यादव को बताना चाहिए कि लव जेहाद के नाम पर उनकी सरकार में मुस्लिम युवाओं पर हमले किए गए और भड़काऊ भाषण देकर साक्षी महराज, योगी आदित्यनाथ जैसे भाजपा सांसद समाज में आग लगाते रहे और उनपर उन्होंने कोई कार्रवाई क्यों नहीं की। 

द्वारा जारी 
शाहनवाज आलम
प्रवक्ता रिहाई मंच
9415254919
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