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बुधवार, 13 जुलाई 2011

दलित राजनीति : शिकायत दूर, आपत्ति नहीं

अनिल चमड़िया
लेखक








दलित राजनीति: शिकायत दूर, आपत्ति नहीं
दलित राजनीति: शिकायत दूर, आपत्ति नहीं
उत्तर प्रदेश से आने वाली खबरों की भाषा इन दिनों इस तरह शुरू होती है-
'दलित मुख्यमंत्री के राज में दलितों के साथ यह हो रहा है, वह हो रहा है." आखिर ऐसी भाषा का प्रयोग किसी दलित के मुख्यमंत्री बनने के साथ ही क्यों होता है और यह कितना उचित है ? ऐसी भाषा का प्रयोग करने के पीछे जो समझ काम करती है उसे एक पत्रकार की वर्षों पुरानी एक प्रतिक्रिया से समझने की कोशिश की जा सकती है.

1979 में जब मोराईजी देसाई के नेतृत्ववाली सरकार का पतन हो गया तब राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी को सरकार के लिए नये नेतृत्व को आमंत्रित करना था. जनता पार्टी के अध्यक्ष के रूप में चंद्रशेखर सांसदों की सूची तैयार कर रहे थे. उसी वक्त जगजीवन बाबू को पता चला कि रेड्डी ने चौधरी चरण सिंह को सरकार बनाने के लिए न्योत दिया है. तब जगजीवनबाबू ने प्रतिक्रिया व्यक्त की कि 'वे हरिजन हैं इसीलिए उन्हें प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया गया."

जिस पत्रकार का जिक्र किया गया है उन्होंने जगजीवन बाबू की इस प्रतिक्रिया के जवाब में कहा कि यही हैं जिन्होंने कुछ समय पूर्व विदेश के एक संवाददाता को उन्हें हरिजन नेता सम्बोधित करने पर फटकारा था और कहा था कि वे हरिजन नेता नहीं बल्कि देश के नेता हैं. इसे जगजीवन बाबू के अंतर्विरोधी विचार के बतौर प्रकट करने की कोशिश की जा रही थी. जबकि क्या वास्तव में ये दोनों बातें अपनी-अपनी जगह पर सही नहीं हैं? दोनों तरह की प्रतिक्रियाओं में अंतर्विरोध नहीं है. बाबू जगजीवन राम की दलित होने के कारण प्रधानमंत्री नहीं बनाये जाने की शिकायत को तो यह वर्णवादी समाज में दलितों के प्रति दुराग्रह को जाहिर कर रहे हैं.
यही मानसिकता उनके दलित परिवार में पैदा होने के कारण उन्हें दलित नेता के रूप में सम्बोधित करती है. आखिर जब कोई सवर्ण परिवार में जन्मा नेता दलितों की बात करता है तो उसे दलित नेता क्यों नहीं कहा जाता है क्योंकि वह सवर्ण है. लेकिन जब दलित परिवार में जन्मा नेता दलितों की बात करता है तो आमतौर पर उसे दलित नेता के रूप में ही सम्बोधित किया जाता है. इसके अलावा जब सवर्ण परिवार में जन्मा नेता सवर्णों के हितों की राजनीति करता है तो उसे जाति व वर्ण विशेष नेता के रूप में सम्बोधित कहां किया जाता है? दलितों के अलावा समाज के दूसरे कमजोर और पिछड़े वर्गों की पृष्ठभूमि के साथ भी इसी तरह सम्बोधन किया जाता है. मुस्लिम पृष्ठभूमि के वैसे नेताओं को राष्ट्रवादी कहा जाता है जो कि मुस्लिम हितों के लिए और उनकी अपेक्षाओं के पूरा नहीं होने की शिकायत कम करते हैं.

भाषा का रिश्ता राजनीति से होता है. उसे एक राजनीतिक औजार के रूप में बरता जाता है. अंतर्चेतना में सक्रिय पूर्वाग्रह को भाषा के जरिये अभिव्यक्त होने से रोकना सम्भव नहीं हो पाता है. उत्तर प्रदेश में मायावती के मुख्यमंत्री बनने के बाद दलितों के खिलाफ अत्याचार की घटनाओं के लिए दलित को ही क्यों कटघरे में खड़ा किया जाता है. उत्तर प्रदेश में जितनों ने भी सरकार का नेतृत्व किया है उन सभी के शासनकाल में दलितों के साथ अत्याचार की घटनाएं घटी हैं. सामाजिक स्तर पर भी और प्रशासनिक स्तर पर भी. लेकिन उन घटनाओं की खबर की भाषा नेतृत्व की जाति को कटघरे में खड़ा नहीं करती है.

सरकार की विफलता के रूप में दर्ज करने की भाषा रही है. मायावती के शासनकाल में दलितों के खिलाफ उत्पीड़न की खबर की भाषा के जातीय रूप में बदलने का क्या तर्क हो सकता है? बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम ने दलितों को राजनीतिक तौर पर जागरूक किया और इस तरह से किया जिसकी कड़ी डॉ.अम्बेडकर की राजनीतिक धारा से जुड़ती है. मायावती कांशीराम की उत्तराधिकारी हैं. वे भी कांशीराम के स्वर में तो स्वर मिलाती रही हैं. भारतीय समाज में दलितों के भीतर आत्मविश्वास को जगाने का काम कई तरह के नेतृत्व ने अपने-अपने तरीके से किया है. लेकिन डॉ. अम्बेडकर के बाद कांशीराम ने ही संसदीय व्यवस्था में राजनीतिक नेतृत्व लेने का आत्मविश्वास दलितों के बीच विकसित किया है. बराबरी हासिल करना एक राजनीतिक दर्शन है.

आधुनिक राजनीति में समाजवाद और लोकतंत्र ही राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का आधार है. भारतीय समाज में समाजवाद के लिए सामाजिक और आर्थिक स्तर पर कमजोर वर्गों को उठाना ही राजनीति का लक्ष्य रहा है. यहां हर किसी को दलित हितों की बात करनी ही है. क्या महात्मा गांधी दलितों की बात नहीं करते तो वे अंग्रेजी सरकार विरोधी आंदोलन का नेतृत्व कर पाते? क्या कांग्रेस दलितों के हित की बात नहीं करती तो वह इतने लम्बे समय तक सत्ता में बनी रह सकती थी? राजनीति में फर्क ये आया कि कांशीराम ने संसदीय नेतृत्व अपने हाथों में लेने का आह्वान किया और हासिल किया. सत्ता में हिस्सेदारी के बजाय सत्ता का नेतृत्व लेने का आह्वान क्या जातिवादी होने का पर्याय है?

भारतीय समाज के लिए जो संसदीय व्यवस्था बनी है उसमें सत्ता के लिए जाति एक प्रमुख घटक के रूप में सक्रिय रहती है. दूसरी तरफ यह भी उतना ही सत्य है कि कोई एक जाति अपने मतों के बूते सत्ता में नहीं आ सकती है. जातियों का गठबंधन ही सत्तासीन बना सकता है. मायावती ने भी अपने नेतृत्व में सर्वजन हिताय का नारा देकर सत्ता की कमान संभाली है लेकिन फिर भी वे दलित नेता के ही रूप में सम्बोधित की जाती हैं. दलित के उत्पीड़न के लिए सरकार और सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व्यवस्था को जिम्मेदार बनाने के बजाय दलित को ही जिम्मेदार ठहराने की भाषा उत्तर प्रदेश की घटनाओं के साथ सक्रिय देखी जाती है.

मुख्यमंत्री मायावती भी ऐसी भाषा और नजरिये के प्रति अपनी शिकायत दर्ज करवाने में सफल हो जाती हैं. ऐसी भाषा का असल मकसद भारतीय समाज में दलितों को उत्पीड़न के समाजशास्त्र से बाहर निकालने का नहीं होता है. दरअसल, सत्ता पर काबिज होने या सत्ता से बेदखल करने के बीच की लड़ाई की भाषा और बराबरी के दर्शन में आस्था रखने की भाषा में बुनियादी फर्क होता है. संसदीय राजनीति में पूरा कारोबार सत्ता पर काबिज होने और बेदखली से जुड़ा होता है.
कमजोर वर्गों के खिलाफ जातिवादी भाषा का इस्तेमाल सत्ता पर वर्चस्व बनाये रखने का हथियार रहा है. यही हथियार उनके खिलाफ संसदीय सत्ता की लड़ाई में भी इस्तेमाल होता है. बाबू जगजीवन राम ने जो शिकायत और आपत्ति की थी वह शिकायत मुख्यमंत्री के रूप में मायावती ने तो खुद दूर की है लेकिन वह आपत्ति अब भी बरकरार है.