साहित्य का कम पढ़ा जाना या न पढ़ा जाना चिंता का विषय है। ऐसे नाजुक दौर में हम मुक्तिकामी साहित्य, विशेषतौर पर दलित साहित्य को उम्मीद की दृष्टि से देख सकते हैं। इस संदर्भ में भारत में दलित साहित्य की भूमिका बहुत ही ऐतिहासिक होने जा रही है। | ||
साहित्य का संकट और दलित लेखन | ||
साहित्य का कम पढ़ा जाना या न पढ़ा जाना चिंता का विषय है। पश्चिमी देशों के विद्वान इसके कारणों को परिभाषित करने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी दृष्टि में भूमंडलीकरण की वजह से पूरी दुनिया में ‘ड्रीम इंडस्ट्री’ का उदय हुआ है। ड्रीम इंडस्ट्री के उदाहरण के तौर पर अगर हम आधुनिक पश्चिमी स्टूडियो को ले सकते हैं, जिसकी वजह से चमत्कारिक चीजों को घटित होते हुए दिखाना संभव हुआ है। चूंकि भारत कपोल कल्पित कहानियों और मिथकों का देश रहा है, इसलिए इस पर इन ड्रीम इंडस्ट्री का असर बहुत तेजी के साथ पड़ा है। उदाहरण के लिए यह एक मिथक है कि राम ने वानरों की मदद से श्रीलंका जाने के लिए समुद्र पर पुल बांध दिया। ड्रीम इंडस्ट्री या वेस्टर्न स्टूडियो या मॉडर्न स्टूडियो की मदद से यह संभव कर दिया कि वे पुल को बांधते हुए दिख रहे हैं। बंधा हुआ पुल भी दिखाई दे रहे हैं। यह चमत्कार इस ड्रीम इंडस्ट्री की वजह से हुआ है। इस तरह जो चीजें पहले कपोल कल्पना या मिथकीय रूप में थीं, वे आमूर्त रूप से सामने आ गईं। आधुनिक तकनीक ने सब बदल दिया। पहले लोग पढ़ते थे तो मिथकों के बारे में खूब सवाल करते थे। लंबी-लंबी और गंभीर बहसें हुआ करती थीं। जैसे हनुमान ने सूरज को अपनी कांख में दबा लिया, इस पर सवाल खड़े किए जाते थे। अब मॉडर्न टेक्नोलॉजी ने इसे कर दिखाया। परदे पर इसे दिखाना बहुत आसान है। इससे मिथकों में ज्यादा लोगों का विश्वास हो रहा है। इस तरह ज्ञान के क्षेत्र में दो क्रियाओं का परिवर्तन हो गया है। पहले लोग पढ़कर ज्ञान इक_ा करते थे, अब देखकर ज्ञान इक_ा कर रहे हैं। पढऩे और देखने में बड़ा भारी फर्क है। दिखाया वही जा रहा है जो मीडिया के मालिक दिखाना चाहते हैं। लोगों की रुचियां बदल रही हैं। पूरा देश और समाज एक खतरनाक दौर से गुजर रहा है। इसके चलते किताबों का महत्व दिन-प्रतिदिन घट रहा है। दर्शनीय चीजें महत्वपूर्ण होती जा रही हैं। ऐसे नाजुक दौर में हम मुक्तिकामी साहित्य, विशेषतौर पर दलित साहित्य को उम्मीद की दृष्टि से देख सकते हैं। दलित साहित्य की एक महत्वपूर्ण भूमिका यह होने जा रही है कि वर्णव्यवस्था (जो कि धर्मजनित है) के विरोध और बुद्धिवादी विचारों पर आधारित होने के कारण यह साहित्य में आए रुचिहीनता के संकट का सामना करने को तैयार है। इसकी वजह यही है कि दलित साहित्य तार्किक है। ठीक वैसे ही जैसे दुनिया के स्तर पर अश्वेत साहित्य, आदिवासी साहित्य और नारीवादी साहित्य है। साहित्य में आई यह रेशनलिटी साहित्य को बाजारवाद से आई विकृतियों से लडऩे में मदद कर रही है। इस संदर्भ में भारत में दलित साहित्य की भूमिका बहुत ही ऐतिहासिक होने जा रही है। दलित साहित्य से जुड़ी एक बड़ी समस्या यह है कि इससे कुछ ऐसे लोग जुड़े हैं जो दलित साहित्य को जातिवादी साहित्य बताने और बनाने में लगे हैं। यह उन्हीं की धारणा है कि दलित साहित्य केवल दलित ही लिख सकता है। ये तो वैसे ही जैसे कोई कहे कि दलित राजनीति केवल दलित ही कर सकता है। यह बहुत ही हास्यास्पद स्थिति है। हिंदी क्षेत्र के दलित आंदोलन में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के उदय के बाद प्रखरता और आक्रामकता आई है, उसका प्रभाव साहित्य पर भी पड़ा है, इसी की वजह से हिंदी के दलित साहित्य में आक्रामकता आई है। इसके चलते अलग-अलग विचार दलितों के अंदर भी उभरकर आए हैं और इसी प्रक्रिया में तमाम अंतर्विरोध उभरकर सामने आ रहे हैं। दलित साहित्य का मतलब जातिवादी साहित्य नहीं है, बल्कि यह जाति व्यवस्था के विरोध का साहित्य है। इसमें वे तमाम साहित्यकार जो वर्ण व्यवस्था के विरोध में रचना कर रहे हैं, वह सारा दलित साहित्य के अंदर आता है। मैं हमेशा से मानता रहा हूं कि दलित साहित्य का उद्गम बौद्ध साहित्य से हुआ है क्योंकि बौद्धों ने सबसे पहले वर्ण व्यवस्था का बहुत सशक्त विरोध किया था। तमाम बौद्ध दार्शनिकों ने वर्ण व्यवस्था के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की। इसी के चलते बौद्धों का सर्वनाश किया गया, बौद्ध मठों को तोड़ा गया तथा फिर से जाति व्यवस्था कायम की गई और उसे बड़ी कड़ाई से लागू किया गया। खासकर शंकराचार्य के उदय के बाद 9वीं सदी में यह तेजी से हुआ। बौद्धस्थलियों को हिंदू स्थलियों में बदला गया। यह वर्ण व्यवस्था के विरोध का ही परिणाम था। अगर हम यह कहें कि दलित ही दलित साहित्य लिख सकता है तो हम उन तमाम लोगों का अपमान करेंगे जिन्होंने गैर-दलित होते हुए भी जाति व्यवस्था के विरोध और दलितों के उत्थान के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया। इस परंपरा में एक-दो नहीं, हजारों नाम गिनाए जा सकते हैं। एक और ऐतिहासिक सत्य है इस देश में- जाति व्यवस्था को जहां ब्राह्मणों ने बनाया, वहीं इसका विरोध करने वाले भी सबसे पहले ब्राह्मणों के अंदर से ही निकले। इस बात को हमें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। दलितों के अंदर भी जातिवाद और ब्राह्मणवाद हो सकता है, इसलिए दलितों के लिखे को ही दलित साहित्य मानने के तर्क से सहमत नहीं हुआ जा सकता। इस तरह की धारणाएं दलित साहित्य को संकुचित बनाती हैं, उसकी सार्वभौमिकता को नष्ट करती हंै और समाज से दलित साहित्य को काटकर रखती हैं, जो कि बहुत खतरनाक है। दलित साहित्य एक सामाजिक कल्याण की विचारधारा है। इसलिए संकुचित विचारों के लिए इसमें कोई स्थान नहीं होना चाहिए। (गंगा सहाय मीणा से हुई बातचीत पर आधारित) |
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सोमवार, 11 जुलाई 2011
भारत में दलित साहित्य की भूमिका बहुत ही ऐतिहासिक
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