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मंगलवार, 24 जनवरी 2017

राष्ट्रगान विवादः क्या हम अमरीका से नहीं सीख सकते

       
                                                                                शाहनवाज आलम

मलयाली के चर्चित लेखक कमल चवारा को अपने फेसबुक पर कथित तौर पर राष्ट्रगान के अपमान के आरोप में केरल पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए जाने से एक बार फिर सप्रीम कोर्ट का वह फैसला बहस के कंेद्र में आ गया है जिसमें उसने सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले इसे बजाए जाने और सभी का खड़े होना अनिवार्य बताया है। गौरतलब है कि कमल चवारा से पहले भी गोवा मंे एक विकलांग व्यक्ति को सिनेमा घर में लोगों ने राष्ट्र गीत के समय नहीं खड़े होने पर पीटा था और हाल में चेन्नई में एक फिल्म महोत्सव के दौरान भी ऐसे ही आरोप में 6 लोगांे को पुलिस ने गिरफ्तार किया था।

इन घटनाओं मंे एक खास संदर्भ का जिक्र किया जाना जरूरी है कि पुलिस में शिकायत करने वाले लोग एक खास वैचारिक-राजनीतिक समूह से ताल्लुक रखने वाले हैं। मसलन, कमल चवारा के मामले मंे शिकायतकर्ता भाजपा नेता है जिसने चवारा के उस पोस्ट को राष्ट्रविरोधी बताया है जिसमें लेखक ने अपने एक अप्रकाशित उपन्यास के एक हिस्से को फेसबुक पर डाला था। जिसमें एक स्कूल का जिक्र है जहां शिक्षक छात्रों को कक्षा के दौरान शौचालय जाने की इजाजत नहीं देते। दोपहर 4 बजे कक्षा के खत्म होने पर छात्र राष्ट्रगान गाते हैं। ऐसे में छात्रों के लिए राष्ट्रगान का मतलब होता है कि वे अब शौचालय जा सकते हैं। जाहिर है कोई भी विवकेशील और प्राकृतिक जरूरतों से वाकिफ व्यक्ति बच्चों से जुड़े इस घटनाक्रम को कथित राष्ट्रवाद के नजरिए से नहीं देख सकता। अगर वो ऐसा करता है तो उसे या तो बच्चों की प्राकृतिक जरूरतों का ज्ञान नहीं है या फिर वो किसी ऐसी विचारधारा का शिकार है जिसने उसे इंसान छोड़ा ही नहीं है। क्योंकि किसी बच्चे को कभी भी बाथरूम जाने की जरूरत पड़ सकती है और ऐसी स्थिति में अगर उसका शिक्षक उसे पहले राष्ट्रगान गवाए तो बच्चे राष्ट्रगान को अपनी प्राकृतिक जरूरतों के बीच एक बाधा के बतौर ही देखेंगे।

इसलिए इस मुद्दे के बहाने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर बहस होनी चाहिए जिसकी आड़ में राष्ट्रवाद का एक अमानवीय और अस्वाभाविक संस्करण तैयार किया जा रहा है। जाहिर है जिस फैसले का सबसे ज्यादा उपयोग या दुरूपयोग अगर सत्ताधारी पार्टी और उसकी वैचारिकी से जुड़े लोग करते हैं तो उस फैसले को भी एक राजनीतिक और विचारधारात्मक फैसला ही माना जाएगा और इसी नजरिए से उसपर बात भी होनी चाहिए। सवाल यह भी होना चाहिए कि क्या अदालत या किसी जज को इसतरह की छूट दी जा सकती है कि वह अपने ही पुराने फैसलों को बिना जेरे गौर लाए सत्ता के विचारधारा से रंगा फैसला सुनाए। ये सवाल इसलिए भी अहम है कि सुप्रीम कोर्ट ने प्रोफेसर बीज्यू एमेन्यूएल केस में दिए गए अपने ही ऐतिहासिक फैसले को भी संदर्भ में नहीं लिया। जिसका जिक्र पूर्व एटर्नी जनरल सोली सोराबजी ने भी इस फैसले पर आपत्ती जाहिर करते हुए किया है कि जजों ने 1985 के अपने ही फैसले को नजरअंदाज कर दिया जिसमें ऐसे ही मामले में जब तीन बच्चे इसलिए राष्ट्रगान में खड़े नहीं हुए थे क्यांेकि वे जिस जेहावा मजहब को मानते हैं उसमें ईश्वर के अलावा किसी और की वंदना नहीं की जाती। उक्त फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि राष्ट्रगान नहीं गाना राष्ट्रगान का अपमान नहीं है।

इस रोशनी में देखा जाए तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने राष्ट्रवाद के हिंदुत्ववादी परिभाषा पर ही मुहर लगाई है। इसीलिए इस मुद्दे पर समाज विचारधारात्मक आधार पर बंट गया है जो न्यायपालिका की छवि के लिए ठीक नहीं है। क्योंकि जहां इससे देश की बहुलतावादी संस्कृति पर अदालत के उकसावे से हमले बढे़ंगे वहीं सभ्यतागत विकास की धारा भी ठहर जाएगी। जिसके लिए व्यक्तियों और समुदायों में वैचारिक और सांस्कृतिक मतभिन्नता का स्पेस सबसे जरूरी होता है।

दरअसल इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला खुद अपने आप में अस्पष्ट और अंतरविरोधी भी है। मसलन, इसमें कहा गया है कि राष्ट्रगान का किसी भी तरह का व्यावसायिक इस्तेमाल नहीं हो सकता जिससे कोई भी किसी तरह का व्यावसायिक लाभ नहीं उठा सके। जबकि सिनेमा हाॅल अपने आप में एक व्यावसायिक केंद्र होते हैं जिन्हें आर्थिक लाभ के लिए ही संचालित किए जाते हैं। वहीं बदलते समय में राजनीति भी व्यवसाय ही बन गई है जहां राष्ट्र गान और राष्ट्रवाद की सबसे ज्यादा तिजारत की जाती है। वहीं इस फैसले में यह भी कहा गया है कि इसे किसी मनोरंजन कार्यक्रम का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता है, जबकि सिनेमा हाॅल में अधिकतर लोग सिर्फ मनोरंजन के उद्येश्य से ही जाते हैं और सिनेमा हाॅल मनोरंजन कर भी देते हैं। यानी ये फैसला ही अपने आप में न्यायिक भाषा में कहें तो ‘नाॅन ऐप्लिकेशन आॅफ माइंड’ का बनता है और इसमें तार्किक आधार पर फैसले पर पहंुचने के बजाए हठ और हड़बड़ी ज्यादा दिखती है। इसीलिए समाज का एक बड़ा तबका इसे न्यायिक के बजाए राजनीतिक फैसले के बतौर देख रहा है।

दरअसल किसी भी पिछले वक्त से ज्यादा आज यह याद रखने की जरूरत है कि पूरी दुनिया में जितने लोग राष्ट्रवाद नाम के उन्माद में मारे गए हैं उतना किसी और कारण से नहीं मारे गए। किसी को राष्ट्रवाद के नाम पर उत्पीड़ित करना सबसे निकृष्टतम अपराध है जिसमें अपराधी किसी भी अन्य तरह के अपराधों के मुकाबले ज्यादा अतार्किक कारणों से हिंसा करता है। क्योंकि वो जिस आधार पर हिंसा करता है या दंड देता है उसका कोई स्पष्ट और स्थाई स्वरूप नहीं होता, सिर्फ काल्पनिक और मनोगत धारणा होती है। मसलन, भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी जब बटवारे से पहले मौजूदा पाकिस्तान में रहते थे तब उनके लिए भारत माता और राष्ट्रवाद की भौगोलिक सीमा मंे मौजूदा पाकिस्तान से लेकर बांग्लादेश तक सब आता होगा। लेकिन बटवारे और उनके भारत आ जाने के बाद वो संकुचित हो गया। ये परिर्वतन सिर्फ 70 सालों में हुआ है। इसलिए आज से सौ दो सौल बाद भारतीय राष्ट्रवाद की भौगोलिक सीमा क्या होगी ये कोई नहीं जानता। दरअसल, राष्ट्रवाद अपने आप में हिंसक कबीलाई संस्कृति के अवशेष के अलावा कुछ भी नहीं है। जिसकी संचालक शक्ति दूसरे भौगोलिक और जातिय समुदायों से नफरत और उनके अस्तित्व का नकार है। इसीलिए राष्ट्रवाद तार्किक और ठोस धरातल पर कोई बात नहीं करता वो दूसरों के पतन की काल्पनिक कहानियां गढ़ता और सुनाता है। इकबाल का मशहूर तराना ‘सारे जहां से अच्छा’ इसका सबसे अच्छा सुबूत है। जब वो कहते हैं ‘यूनान-ओ-मिस्र-ओ रोमा, सब मिट गए जहां से, अब तक मगर है बाकी नामो-ओ-निशां हमारा’। अब कोई मूर्ख ही होगा जो ये माने कि यूनान, मिस्र और रोम दुनिया से मिट चुके हैं और सिर्फ भारत ही धरती पर एक मात्र देश बचा है। कल्पना करिए कि भारतीय खिलाड़ी दल इन तीनों में से किसी एक देश में हो रहे ओलम्पिक में शामिल होने गया हो और यही तराना हमारा राष्ट्रगान हो। नियम के मुताबिक लाखों स्थानीय दशर्कों से भरे स्टेडियम में हमारा दल अपना राष्ट्रगान गाता और उन्हें बताता कि उनके देश का तो नामोनिशान मिट चुका है, तो इसके क्या परिणाम होते? कोई भी खिलाड़ी वापस सकुशल लौट पाता?

दरअसल हमें ऐसी घटनाओं पर दूसरे देशों के अनुभवों से सीख लेनी चाहिए। मसलन, अश्वेत अमरीकी एथलीट काॅलिन केपरनिक पिछले दिनों राष्ट्रगान के दौरान अश्वेतों पर बढ़ती हिंसा के विरोध स्वरूप खड़े नहीं हुए। जिसपर वहां के कथित श्वेत राष्ट्रवादियों ने हंगामा मचा दिया। लेकिन दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति ओबामा ने यह कह कर पूरी दुनिया के संकिर्णतावादियों को खामोश कर दिया कि वे केपरनिक की भावनाओं का सम्मान करते हैं और ऐसा करके उन्होंने संविधानप्रदत असहमत होने के अधिकार का ही इस्तेमाल किया है। उन्होेंने आगे कहा कि हमारे संविधान, हमारे अभिव्यक्ति के अधिकार के प्रति हम कितने निष्ठावान हैं इसकी परिक्षा तब पास करना ज्यादा जरूरी होता है जब स्थितियां बहुत कठिन हों।

इसलिए अगर एक बेहतर देश बनना है तो न्यायपालिका को संकिर्णता से बचना होगा। उसे जेरे बहस राष्ट्रगान के मुद्दे पर उसके रचईता टैगोर के इन शब्दों को जरूर याद रखना चाहिए कि ‘मेरे देशवासी अपने वास्तविक भारत को तभी प्राप्त कर पाएंगे जब वे उस धारणा से लड़ पाएंगे जो उन्हें सिखाती है कि देश मानवता के आर्दशों से बड़ा होता है।