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सोमवार, 13 जून 2011

प्रो. तुलसी राम बनें ‘दलित लेखक संघ’ के अध्यक्ष



पिछले दिनों (11 जून 2011), नई दिल्ली मे बुलायी गई आमसभा की बैठक में नए पदाधिकारियों एवं कार्यकारिणी का चुनाव संपन्न हुआ। चुनाव की पूरी प्रक्रिया चार चुनाव अधिकारियों, प्रो0 गोपेश्वर सिंह (अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय) डा. आर.पी. ममगाईं (निदेशक भारतीया दलित अध्ययन संस्थान) प्रो. सुबोध मालाकर (जे.एन.यू.) श्री चन्द्रभूषण (वरिष्ठ पत्रकार, नवभारत टाईम्स) दो पर्यवेक्षक प्रो. चौथीराम यादव (बनारस विश्वविद्यालय) एवं प्रो. वी. एन. पांडे (रांची विश्वविद्यालय) की देख रेख में लोकतांत्रित विधी एवं आम सहमती से पूरी की गई। इस आमसभा में ‘दलित लेखक संघ’ के लगभग साठ रचनाकारों में भाग लिया।
अध्यक्ष पद पर सर्वसम्मती से प्रो. तुलसी राम को चुना गया। उपाध्यक्ष के दो पदों पर प्रो. हेमलता महिश्वर एवं पना लाल, महासचिव पद पर डा राम चंद्र, सचिव पद पर डा. कौशल पंवार, सह-सचिव के चार पदों पर डा. सुमित्रा महरोल, राज वालमीकि, डा. हेमलता एवं जाकिर हुसैन, मीडिया सचिव के पद पर विनोद सोनकर, कोषाध्यक्ष पद पर दिलीम कठेरिया, कार्यकारिणी सदस्यों में सावी सावरकर, अनिल सुर्या, इंतिजार नईम, सूरज बड़त्या, विनीता रानी, अभय खाखा, प्रमोद कुमार, मीनाक्षी, प्रवीण कुमार, ब्रह्नंद, शिवदत्त, ब्राती विश्वास, सतीश चन्द्रा एवं केदार प्रसाद मीणा का सर्वसम्मति से चयन हुआ। इस कार्यकारिणी का कार्यकाल तीन वर्ष होगा। आम सहमति से प्रो. विमल थोरात को द्लेस का संरक्षक बनाया गया।
दलेस का अध्यक्ष पद ग्रहण करते हुए प्रो. तुलसी राम ने अपने वक्तव्य में दलित साहित्य को व्यापक फलक से जोड़ते हुए कहा कि बुद्ध, फुले, अम्बेडकर की वैचारिकी लोकतांत्रिक वैचारिकी है। जातिवाद, सांप्रदायिकता और क्षेत्रीयता इसके तीन बड़े दुश्मन है। दलित साहित्य प्रगतिशील विचारकों पर आक्रमणकारी टीका टिप्पणी का भी विरोध करता है। हमें यह नहीं भुलना चाहिए कि प्रतिरोध की परंपरा प्रगतिशील लोगों के बिना पूरी नहीं होगी।
प्रो. गोपेशवर सिंह ने दलेस की नवनिर्वाचित कार्यकारिणी को बधाई देते हुए कहा कि दलित रचनाकार अपनी रचनाओं के माध्यम से दलित साहित्य को ऐसे मुकाम पर ले जाए की वह भारत के मुख्य धारा के साहित्य के रूप में स्थापित हो और दलित शब्द से मुक्त हो जाए।
चुनाव पर्यवेक्षक प्रो चौथीराम यादव ने अपने वक्तव्य में कहा कि जाति आधारित सामाजिक संरचना वाले भारत देश में मुक्तिकामी विचारधारा मार्कसवाद की सफलता का रास्ता अम्बेडकर के दर्शन को बाईपास करके नहीं जा सकता। उसे वाया अम्बेडकरवाद ही जाना होगा।
नवनिर्वाचित महासचिव डा. रामचंद्र ने कार्यभार संभालते हुए कहा कि ‘दलेस‘ दलित साहित्य आंदोलन की वैचारिकी से सबंद्ध होकर कार्य करेगा। दिल्ली व दिल्ली से बाहर गांव देहात में दलित साहित्य आंदोलन की नई पीड़ी के शिक्षण-प्रशिक्षण द्वारा दलित साहित्य को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय फलक पर विस्तार देने का प्रयास करेगा। इसी क्रम में प्रो. हेमलता महिश्वर, पन्नालाल, डा. आर.पी. ममगाईं, प्रो. सुबोध मालाकार, श्री चन्द्रभूषण, प्रो. वी.एन. पांडे ने नई कार्यकारिणी को बधाई देते हुए अपने विचार रखे। संचालन दिलीप कठेरिया एवं डा. रामचंद्र ने किया।
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दिलीप कठेरिया, कोषाध्यक्ष, दलित लेखक संघ, नई दिल्ली।

मंगलवार, 10 मई 2011

पत्रकारिता पाठ्यक्रम को क्लास के दायरे से बाहर करो, सामाजिक बनाओ





हम मास मीडिया के छात्र एवं छात्राएं विश्वविद्यालय द्वारा किए जा रहे व्यवहार को लेकर दुखी है। अपनी नाराजगी को जाहिर करने के लिए संवैधानिक लोकतंत्र में दिए गए अधिकारों का उपयोग करते हुए आंदोलन कर रहे हैं। लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन हमें संविधान के अधिकारों का उपयोग करने से रोकने की हरसंभव कोशिश कर रहा है। हम इसकी निंदा करते हैं। और ये बताना चाहते है कि हम अपनी मांगों के समर्थन में आंदोलन करते रहेंगे।
हमारा अपना अनुभव है कि मास मीडिया के कोर्स के स्वभाव और प्रकृति और विश्वविद्यालय की इसके बारे में  समझ में एक दूरी बनी हुई है। मास मीडिया के कोर्स के बारे में शायद यह बुनियादी समझ भी गायब है कि  इस कोर्स के जरिये हमें लोकतंत्र की सुरक्षा और उसे मजबूत करने के उद्देश्य से पीढ़ी तैयार करनी है। मास  मीडिया के छात्र छात्राएं पहले तो इस बात को लेकर दुखी है कि विश्वविद्यालय उसके कई विद्यार्थियों को परीक्षा में शामिल होने से रोक रहा है। इनमें ज्यादातर छात्राएं हैं। हमने मास मीडिया के कोर्स के स्वभाव और प्रकृति के अनुकूल बड़ी मेहनत से परीक्षा के लिए खुद को तैयार किया है। लिहाजा हम मांग करते हैं कि आप तत्काल सभी विद्यार्थियों को परीक्षा में बैठने की अनुमति प्रदान करें। इस कोर्स के विद्यार्थियों के बारे में कहा जा रहा है कि वे एक न्यूनतम संख्या में कक्षाओं में उपस्थित नहीं रहे हैं। जबकि वास्तविकता है कि हमने व्यवहारिक तौर पर अधिकतम कक्षाएं की है। कक्षाओं में तकनीकी तौर पर उपस्थिति नहीं होने के कई कारण हो सकते हैं। एक निश्चित समय में चलने वाली कक्षाओं के समय में विद्यार्थियों को शारीरिक , पारिवारिक, सामाजिक ऐसी समस्याएं खड़ी हो सकती हैं जिन्हें तत्काल नजरअंदाज किया जाना संभव नहीं होता है। मास मीडिया के कई विद्यार्थी तकनीकी जरूरत के तौर पर अपना मेडिकल प्रमाण पत्र भी दे रहे हैं लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन उसे लेने से इंकार कर रहा है। इस तरह के मनमानेपन को लोकतंत्र में तानाशाही कहते हैं।
हम आपसे ये अपेक्षा करते हैं कि आप हमारी इन मांगों पर तत्काल विचार करेंगे।
1)       मास मीडिया के सभी विद्यार्थियों को परीक्षा में बैठने की अनुमति दी जाए।
2)      मास मीडिया के कोर्स की प्रकृति और स्वभाव की समझ विकसित करने की प्रक्रिया शुरू की जाए।
3)      मास मीडिया के कोर्स के अब तक के अनुभव और बदलती हुई परिस्थितियों में उनकी उपयोगिता का मूल्यांकन किया जाए।
4)      मास मीडिया कोर्स के व्यवहारिक पक्ष पर जोर दिया  जाए।
5)      मास मीडिया के विद्यार्थियों के साथ हर तीन महीने पर कुलपति के साथ बातचीत का सिलसिला शुरू किया जाए।
6)      मास मीडिया की दुनिया से विद्यार्थियों के लगातार संपर्क में रखने के उद्देश्य से एक मासिक पत्रिका का प्रकाशन सुनिश्चित किया जाए।
7)      मास मीडिया के विद्यार्थियों का दूसरे विषयों के विद्यार्थियों के साथ संवाद की कक्षाएं आयोजित की जाए।
8)      मास मीडिया की जो पुस्तकें कक्षा में पढ़ाई जाती है उनकी उपयोगिता का मूल्यांकन किया जाए।
9)      मास मीडिया में महात्मा गांधी नरेगा  जैसे कार्यक्रमों को शामिल किया जाए। ग्रामीण अंचलों में सामाजिक कल्याण के कार्यक्रमों का अध्ययन करने के लिए विद्यार्थियों के दौरे की कक्षाएं अनिवार्य की जाए।

जामिया के छात्रों और जर्नलिस्ट यूनियन फार सिविल सोसाईटी (jucs) की तरफ से जारी
शाहआलम, अली अख्तर, गुफरान,शारिक, अवनीश राय, विजय प्रताप, ऋषि कुमार सिंह, फहद हसन,उदयन विश्वास,आरहन सेठ,डेजी डेका, कजरी अख्तर,नाबिला जेहरा जैदी,ओलिम्का यफ्तो,सबा रहमान,सना जमाल, सानिया अहमद,स्मृति दीवान,सुर्पना सरकार, राघवेंद्र प्रताप सिंह, अरूण कुमार उरांव, प्रबुद्ध गौतम, अर्चना महतो, विवेक मिश्रा, राकेश, देवाशीष प्रसून, दीपक राव, प्रवीण मालवीय, ओम नागर, तारिक, मसीहुद्दीन संजरी, वरूण, मुकेश चौरासे,. शाहनवाज आलम, नवीन कुमार,
9873672153, 9910638355, 9313139941, 09911300375



      

मंगलवार, 3 मई 2011

आलोकधन्वा/ दुनिया रोज़ बनती है



आलोकधन्वा
सन्‌ १९४८ में मुंगेर (बिहार) ज़िले में जन्मे आलोकधन्वा की पहली कविता ‘जनता का आदमी’ १९७२ में ‘वाम’ पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। वे हिंदी के उन बड़े कवियों में हैं, जिन्होंने ७० के दशक में कविता को एक नई पहचान दी। उनका पहला संग्रह है- दुनिया रोज बनती है  उसी वर्ष ‘फ़िलहाल’ में ‘गोली दाग़ो पोस्टर’ कविता छपी। ये दोनो कविताएँ देश के वामपंथी सांस्कृतिक आंदोलन की प्रमुख कविताएँ बनीं और आलोक बिहार, पश्चिम बंगाल, आंध्र और पंजाब के लेखक संगठनों से गहरे जुड़े। १९७३ में पंजाबी के शहीद कवि पाश के गाँव तलवंडी सलेम में सांस्कृतिक अभियान के लिए गिरफ़्तारी और जल्द ही रिहाई।
कपड़े के जूते, पतंग, भागी हुई लड़कियाँ, और ब्रूनो की बेटियाँ हिन्दी की प्रसिद्ध कविताएँ हैं, जैसी
लंबी कविताएँ हिंदी और दूसरी भाषाओं में व्यापक चर्चा का विषय बनीं। वे पिछले दो दशकों से देश के विभिन्न हिस्सों में सांस्कृतिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय रहे हैं। उन्होंने छोटा नागपुर के औद्योगिक शहर जमशेदपुर में अध्ययन मंडलियों का संचालन किया और रंगकर्म और साहित्य पर कई राष्ट्रीय संस्थानों और विश्वविद्यालयों में अतिथि व्याख्याता के रूप में भागीदारी की। वे प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, और जन संस्कृति मंच के आयोजनों में भी सक्रिय रहे हैं। उन्हें प्रकाश जैन स्मृति सम्मान, बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान, राहुल सम्मान,  पहल सम्मान, नागार्जुन सम्मान, फ़िराक़ गोरखपुरी सम्मान, भवानी प्रसाद मिश्र स्मृति सम्मान और गिरिजा कुमार माथुर सम्मान-नई दिल्ली, और बिहार राष्ट्रभाषा परिषद का विशेष साहित्य सम्मान आदि प्राप्त हुए हैं उनकी कविताएँ अंग्रेजी, रूसी और सभी भारतीय भाषाओं में अनूदित हुई हैं। प्रोफ़ेसर डेनियल वाइसबोर्ट और गिरधर राठी के संपादन में साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित हिंदी कविताओं के अंग्रेजी संकलन ‘सरवाइवल’ में उनकी कविताएँ संकलित हैं। इसके अलावा प्रसिद्ध अमेरिकी पत्रिका ‘क्रिटिकल इन्क्वायरी’ में भी अनुवाद प्रकाशित हुए हैं।
आलोकधन्वा संप्रति महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में ‘राइटर इन रेजीडेंस’ के रुप में कार्यरत हैं।
बारह बर्षों के बाद आलोकधन्वा की चार नयी कविताएँ
http://www.hindisamay.com/images/alokdhanwa.jpg  





आलोकधन्वा
हिंदी साहित्य में आलोकधन्वा की कविता और काव्य व्यक्तित्व एक अद्‍भुत सतत घटना, एक 'फ़िनोमेनॅन’ की तरह हैं। वे पिछली चौथाई सदी से भी अधिक से कविताएँ लिख रहे हैं लेकिन बहुत संकोच और आत्म संशय से उन्होंने अपना पहला संग्रह प्रकाशित करना स्वीकार किया है और इसमें रचना-स्फीति नहीं है। हिंदी में जहाँ कई वरिष्ठ तथा युवतर कवि ज़रूरत से ज़्यादा उपजाऊ और साहिब-ए-किताब हैं वहाँ आलोकधन्वा का यह संयम एक कठोर व्रत या तपस्या से कम नहीं है, और अपने आप में एक काव्य-मूल्य है।
जनता का आदमी, गोली दागॊ पोस्टर, भागी हुई लड़कियाँ और ब्रूनो की बेटियाँ सरीखी कविताएँ मुक्तिबोध, नागार्जुन, रघुबीर सहाय तथा चंद्रकाम्त देवताले की काव्य-उपस्थितियों के समानान्तर हिंदी कविता तथा उसके आस्वादकों में कालजयी जैसी स्वीकृत हो चुकी हैं - विष्णु खरे
सन्‌ 1998 में उपरांकित पंक्तियाँ वरिष्ठ कवि विष्णु खरे ने तब लिखी थीं जब आलोकधन्वा का पहला काव्य संकलन ‘दुनिया रोज़ बनती है’ प्रकाशित हुआ। समकालीन हिंदी कविता के गंभीर एवं प्रतिबद्ध पाठकों के बीच ‘दुनिया रोज़ बनती है’ असाधारण रूप से चर्चित और सम्मानित हुई। इस कृति का तीसरा संस्करण भी समाप्तप्राय है। इस कृति को भवानी प्रसाद मिश्र स्मृति पुरस्कार (म.प्र.) और बेहद चर्चित पुरस्कार ‘पहल सम्मान’ प्रदान किया गया। साथ हीइन्हें नयी दिल्ली में ‘गिरिजा कुमार माथुर स्मृति पुरस्कार’ और विदिशा के रामकृष्ण प्रकाशन द्वारा पहला ‘नागार्जुन सम्मान’ एवं गोरखपुर का विशिष्ट काव्य पुरस्कार ‘फ़िराक गोरखपुरी स्मृति सम्मान’ भी मिल चुका है।
अपनी पुस्तक के प्रकाशन के बारह वर्षों बाद आलोकधन्वा की चार ताजा कविताएँ बहुवचन के नये अंक में प्रकाशित हुई हैं। जीवन की छोटी-छोटी चीज़ों और बातों पर बहुत ईमानदारी से लिखी गयी ये कविताएँ उनकी सर्जनात्मक प्रतिभा का नया साक्ष्य हैं। आशा है उनकी कविता का अरसे से इन्तज़ार कर रहे पाठक इन्हें पसंद करेंगे। हिंदी कविता के सुधी पाठकों के लिए यह एक सुखद घटना है। हम इन्हें अतीव प्रसन्नता के साथ यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं: 



मुलाक़ातें

अचानक तुम आ जाओ

इतनी रेलें चलती हैं
 
भारत में
कभी
कहीं से भी आ सकती हो
मेरे पास

कुछ दिन रहना इस घर में
जो उतना ही तुम्हारा भी है
तुम्हें देखने की प्यास है गहरी
तुम्हें सुनने की

कुछ दिन रहना
जैसे तुम गई नहीं कहीं

मेरे पास समय कम
 
होता जा रहा है
मेरी प्यारी दोस्त

घनी आबादी का देश मेरा
कितनी औरतें लौटती हैं
शाम होते ही
अपने-अपने घर
कई बार सचमुच लगता है
तुम उनमें ही कहीं
आ रही हो
वही दुबली देह
बारीक चारखाने की
सूती साड़ी
कंधे से झूलता
झालर वाला झोला
और पैरों में चप्पलें
मैं कहता जूते पहनो खिलाड़ियों वाले
भाग दौड़ में भरोसे के लायक
 

तुम्हें भी अपने काम में
 
ज़्यादा मन लगेगा
मुझसे फिर एक बार मिलकर
 
लौटने पर
 

दुख-सुख तो
 
आते जाते रहेंगे
सब कुछ पार्थिव है यहाँ
लेकिन मुलाक़ातें नहीं हैं
पार्थिव
इनकी ताज़गी
रहेगी यहीं
हवा में !
इनसे बनती हैं नयी जगहें
एक बार और मिलने
 के बाद भी
एक बार और मिलने
 की इच्छा
पृथ्वी पर कभी ख़त्म नहीं होगी



आम के बाग़

आम के फले हुए पेड़ों
 
के बाग़ में
कब जाऊँगा?

मुझे पता है कि
 
अवध, दीघा और मालदह में
घने बाग़ हैं आम के
 
लेकिन अब कितने और
 
कहाँ कहाँ
 
अक्सर तो उनके उजड़ने की
 
ख़बरें आती रहती हैं।

बचपन की रेल यात्रा में
 
जगह जगह दिखाई देते थे
आम के बाग़
बीसवीं सदी में
 

भागलपुर से नाथनगर के
बीच रेल उन दिनों जाती थी
आम के बाग़ों के बीच
 
दिन में गुजरो
तब भी
रेल के डब्बे भर जाते
 
उनके अँधेरी हरियाली
 
और ख़ुशबू से

हरा और दूधिया मालदह
 
दशहरी, सफेदा
बागपत का रटौल
 
डंटी के पास लाली वाले
कपूर की गंध के बीजू आम

गूदेदार आम अलग
खाने के लिए
और रस से भरे चूसने के लिए
 
अलग
ठंढे पानी में भिगोकर

आम खाने और चूसने
के स्वाद से भरे हैं
मेरे भी मन प्राण

हरी धरती से अभिन्न होने में
 
हज़ार हज़ार चीज़ें
हाथ से तोड़कर खाने की सीधे
और आग पर पका कर भी

यह जो धरती है
मिट्टी की
 
जिसके ज़रा नीचे नमी
 
शुरू होने लगती है खोदते ही !

यह जो धरती
 
मेढक और झींगुर
 
के घर जिसके भीतर
 
मेढक और झींगुर की
 
आवाज़ों से रात में गूँजने वाली

यह जो धारण किये हुए है
सुदूर जन्म से ही मुझे
हम ने भी इसे संवारा है !

यह भी उतनी ही असुरक्षित
 
जितना हम मनुष्य इन दिनों

आम जैसे रसीले फल के लिए
 
भाषा कम पड़ रही है
मेरे पास

भारतवासी होने का सौभाग्य
तो आम से भी बनता है!
गाय और बछड़ा


एक भूरी गाय
 
अपने बछड़े के साथ
 
बछड़ा क़रीब एक दिन का होगा
घास के मैदान में
जो धूप से भरा है

बछड़ा भी भूरा ही है
लेकिन उसका नन्हा
गीला मुख
ज़रा सफेद
 

उसका पूरा शरीर ही गीला है
गाय उसे जीभ से चाट रही है

गाय थकी हुई है ज़रूर
प्रसव की पीड़ा से बाहर आई है
 
फिर भी
बछड़े को अपनी काली आँखों से
निहारती जाती है
और उसे चाटती जा रही है

बछड़े की आँखें उसकी माँ
से भी ज़्यादा काली हैं
 
अभी दुनिया की धूल से अछूती

बछड़ा खड़ा होने में लगा है
 
लेकिन
कमल के नाल जैसी कोमल
उसकी टाँगें
क्यों भला ले पायेंगी उसका भार !
वह आगे के पैरों से ज़ोर लगाता
 
है
उसके घुटने भी मुड़ रहे हैं
पहली पहली बार
 
ज़रा-सा उठने में गिरता
है कई बार घास पर
 
गाय और चरवाहा
दोनों उसे देखते हैं

सृष्टि के सबक हैं अपार
 
जिन्हें इस बछड़े को भी सीखना होगा
अभी तो वह आया ही है

मेरी शुभकामना
बछड़ा और उसकी माँ
दोनों की उम्र लम्बी हो

चरवाहा बछड़े को
अपनी गोद में लेकर
जा रहा है झोपड़ी में
गाय भी पीछे-पीछे दौड़ती
जा रही है।
नन्ही बुलबुल के तराने 

एक नन्ही बुलबुल
 
गा रही है
इन घने गोल पेड़ों में
कहीं छुप छुप कर
गा रही है रह-रह कर

पल दो पल के लिए
 
अचानक चुप हो जाती है
तब और भी व्याकुलता
जगाती है
तरानों के बीच उसका मौन
कितना सुनाई देता है !

इन घने पेड़ों में वह
 
भीतर ही भीतर
 
छोटी छोटी उड़ानें भरती है
घनी टहनियों के
 
हरे पत्तों से
खूब हरे पत्तों के
झीने अँधेरें में
 
एक ज़रा कड़े पत्ते पर
 
वह टिक लेती है

जहाँ जहाँ पत्ते हिलते हैं
तराने उस ओर से आते हैं
वह तबीयत से गा रही है
अपने नये कंठ से
 
सुर को गीला करते हुए
 
अपनी चोंच को पूरा खोल कर
 

जितना हम आदमी उसे
सुनते है
आसपास के पेड़ों के पक्षी
उसे सुनते हैं ज़्यादा

नन्ही बुलबुल जब सुनती है
साथ के पक्षियों को गाते
 
तब तो और भी मिठास
घोलती है अपने नये सुर में

यह जो हो रहा है
इस विजन में पक्षीगान
मुझ यायावर को
 
अनायास ही श्रोता बनाते हुए

मैं भी गुनगुनाने को होता हूँ
पुरानी धुनें
 
वे जो भोर के डूबते तारों
जैसे गीत!


रविवार, 10 अप्रैल 2011

Political Machinations of Hindutva


Ram Puniyani
(Film Review)

(Film: Saffron War by Rajiv Yadav, Shahanawaz Alam and Lakshman Prasad, Duration 61 Minutes, Contribution, Rs 95, Available from: 632/13, Shankarpuri, Kamta, Post: Chinhat, Lucknow, UP)

With the rise of Hindutva movement during last three decades there has also been an attempt to understand this phenomenon through analytic essays, articles and films. These films have also served the purpose of spreading the awareness about the rising threat of communalpolitics, and dangers to national integration due to the rising communal tide in the society. The Mumbai violence, Gujarat genocide, Kandhmal amongst others has been the object of serious study and analysis amongst the activists and scholars.‘Saffron War: A War against nation’ is the latest in the series of the significant works, which have come out lately. This film is a unique combination of analysis of Hindutva ideology, its cooption of dalits in to communal politics and the gradual manipulation of the low caste movements from their struggle for social justice to their current mobilization in the fold of Hindutva where they are made to believe that the real problems of society are not due to the caste structure but the external one coming form Muslim minorities.

This film is made in the backdrop of Gorakhpur, where Yogi Adiyanath, A BJP MP has been spreading his tentacles in a very aggressive way.The film’s major contribution is to show as to how Gorakhnath Math has been gradually been shifted away from its struggle against caste oppression, how its focus on intercommunity amity has been shifted away to hatred for the minorities. The film through different interviews and visuals shows us the spread of venom against minorities. The language used by the Yogi and his followers comes under the category of ‘Hate Speech’, which is going on in the open fashion. All the prejudices and biases against minorities, Muslims in particular, are being openly asserted in the public meetings where not only are the Muslims presented in the negative light but also violence is openly propagated and promoted. The imaginary fear of minorities is projected and all the propagation of violence is done in the name of ‘Defense of Hindu religion’. The degree of aggression in the language is shocking to say the least. In many a meetings when these hateful speeches are being made, even the police is standing as the passive listeners, unmindful of the fact that such hate speech should invite strong legal action.
फिल्म


The major mobilization is done in the name of Yogi Adityanath and the majority of people who are mobilized and co-opted are dalits and OBCs. They begin with Savarkar’s definition of Hinduva and Hindu Rashtra is made the base of Hate other propaganda. This goes on to say that Muslims have to be relegated to second class citizenship. They cite the example of Pakistan to spread this hate. Yogi’s propaganda further adds that Muslims’voting rights have to be taken away. Gorakhpur and surrounding areas must be one of the few places where Savarkar is quoted so blatantly in the anti minority tirade. The emphasis on converting UP in to Gujarat through Purvanchal comes up regularly. On the lines of Bajrang Dal, there is formation of Arya Veer Sena and Hindu Yuva Vahini giving the training to youth in the use of arms, with Har Har Mahadev as the war cry.

The film brings out clearly as to how the earlier Bharat Milap procession in this area symbolized Hindu Muslim brother hood, but now it has been converted into the occasion where anti Muslim sentiments are invoked. This has seriously intimidated the Minorities in the area. The role of these forces in the Mau riots of 2005 is well brought out in this film.
While the film does well to focus on the core points of Savarkar ideology and cooption, Sanskrtisation of dalits, there is a need to link up this with the overall Hindutva politics of the country. The link between Savarkar and RSS ideology also should have been highlighted. The strong point of the film is to show the political dynamics of conversion of a low caste, syncretic space into the one dominated by Braminical ideology and Hindutva politics. The film does show in a forthright manner, the way in which Hindutva politics builds up. The history of Gorakhnath Math comes out very well along with the fact the communalization process has converted this syncretic spaces into exclusive Hindutva places. It is Gorakhnath Math where Muslims used to throng in large numbers and were welcome there. The scenario is dismal, there is need to develop political, ideological and cultural campaigns against this politics to bring back the issues of caste and gender in to the mainstream of social movements. The need to work for national integration needs to be highlighted in more ways than one.

While the film is a comprehensive study of communalism in Uttaranchal, Gorakhpur in particular, it should have connected a bit more with the National phenomenon. The film does need some technical improvisation.

SAFFRON WAR


Screening & discussion on documentary film “SAFFRON WAR”



Date - 16 April 2011, Saturday
Time - 2: 4 PM
Venue - UP Press Club







Friends,
The hindutva politics conducted from the Gorakhnath Peeth has been attacking the communal harmony of our state for a long time. The fascist ideology of this politics has its manifestations in some of the dreaded terror blasts in Malegaon, Samjhauta Express, Mecca masjid, Ajmer shrine etc. ‘‘Saffron War’’ is an attempt to understand & analyse the various social, religious, historical & political aspects of this phenomenon, which tends to convert this land of Buddha, Gorakh & Kabir into the battlefield to wage a war against secular India .You all are invited in this discussion.

Realesed by- Md Shoaib, Sandeep Pandey, S.R Darapuri, Arundhati Dhuru, Ambreesh Kumar, Siddhartha Kalhans, Randheer Singh ‘Suman’. Ekta Singh, Ravi Shekhar.
Cotact- 09415012666] 09415022722] 09307140390] 09369444528

गुरुवार, 3 मार्च 2011

भगवा युद्ध : एक युद्ध राष्ट्र के विरुद्ध



जेयूसीएस और फुट प्रिंट्स प्रस्तुति


अवधि. 61 मिनट
इस फिल्म के निर्माण की शुरुआत 2005 में मऊ दंगे के रूप में पूर्वी उत्तर प्रदेश में हिंदुत्ववादियों द्वारा गुजरात दोहराने की कोशिश को समझाने के लिए हुईण् इसके कुछ अंशों को अयोध्या फिल्म महोत्सव और इंडिया हैबिटेट सेंटर नई दिल्ली में प्रदर्शित किया जा चूका हैण् फिल्म के कुछ दृश्यों के आधार पर मानवाधिकार संगठनों ने योगी आदित्यनाथ के खिलाफ उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में मुक़दमा किया हैण्
गोरखनाथ पीठ सदियों से निचली श्रमिक जातियों की ब्राह्मणवाद विरोधी सांस्कृतिक चेतना का केंद्र रहा हैण् कालांतर में मुस्लिमों को एक हिस्सा भी इसके प्रभाव में आया और मुस्लिम जोगियों की एक धरा भी यहाँ से बह निकलीण् लेकिन पिछली एक सदी से यह पीठ सावरकर के हिन्दू राष्ट्र के सपने को साकार करने की प्रयोगस्थली बन गयी हैण् जिसके तहत ष्हिन्दुओं के सैन्यकरण और अल्पसंख्यकों को दोयम दर्जे का नागरिक बनानेष् का खाका खिंचा जा रहा हैण् इस विचार की अभियक्ति समझौता एक्सप्रेसए मालेगांवए मक्का मस्जिदए अजमेर समेत देश के कई हिस्सों में हुए आतंकिवादी विस्फोटों में हुई हैण् यह फिल्म समाज में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने के लिए की जा रही ष्टेरर पोलिटिक्सष् को समझाने का एक प्रयास हैण्

निर्देशक . राजीव यादवए शाहनवाज़ आलमए लक्ष्मण प्रसाद
परिकल्पना . शाहनवाज़ आलमए राजीव यादवए शरद जयसवालए विजय प्रतापए शाह आलम
संपादन दृ राकेश कुमारए संदीप दुबे
सम्पर्क . 623ध्13 शंकरपुरीए कमताए पोस्ट.चिनहटएलखनऊ ;उण्प्रण्द्ध 09415254919ए09452800752ए09028695028

न्यायपालिका में बढ़ते राजनैतिक हस्तक्षेप पर जताई चिंता



मिलकर लड़नी होगी मानवाधिकारों की लड़ाई , हिमांशु कुमार

मानवाधिकार जनसम्मेलन संपन्न


असीमानंद की स्वीकृति के सभी धमाकों की नए सिरे से जांच हो

संजरपुरध् आज़मगढ़ए ;27 फरवरीए2011द्ध श् आज़मगढ़ के निर्दोष मुस्लिम नौजवान ही नहीं सरकारी मशिनरी के निशाने पर छत्तीसगढ़ के ग़रीब आदिवासी भी हैं। वहां पर 650 गांवों जलाकर आदिवासियों को बेघर कर दिया गया। सैकड़ों की संख्या में लोग लापता हैं। मानवाधिकार आयोग जैसी संस्थाएं कहां हैंघ् नए हिन्दुस्तान की लड़ाई छत्तीसगढ़ के आदिवासियों और संजरपूर के निर्दोष नौजवानों को मिलकर लड़नी है।श् ये बातें वरिष्ठ मानवाधिकार नेता हिमांशु कुमार ने संजरपूर में आयोजित विशाल राष्ट्रीय मानवाधिकार जनसम्मेलन में कही।

दिल्ली से आई मानवाधिकार नेता शबनम हाशमी ने जांच एजेंसियों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि मालेगांवए समझौता एक्सप्रेसए मक्का मस्जिद में विस्फोट करने वाले असीमानंद और सुनील जोशी का योगी आदित्यनाथ के साथ गहरा संबंध उजागर हुआ हैए बावजूद इसके आजतक योगी को गिरफ्तार करना तो दूर पूछताछ तक भी नहीं की गई। पीयूसीएल के राष्ट्रीय सचिव चितरंजन सिंह ने कहा कि देश में हुए तमाम धमाकों की नए सिरे से जांच की जाए। उन्होंने संघ परिवार और उसकी फासिस्ट विचारधारा की न्यायपालिका तक में घुसपैठ पर चिंता जताते हुए न्यायपालिका में धर्मनिरपेक्ष मुल्यों की पुनर्बहाली की मांग की। लखनउ के वरिष्ठ वकील मोण् शोएब ने भाजपा के बजाए कांग्रेसए सपा और बसपा को ज़्यादा खतरनाक बताते हुए कहा कि ये पार्टियां भाजपा की दूसरे नंबर की टीम हैंए जो सेकुलर चेहरे के साथ संघ परिवार के एजेन्डे को बढ़ा रही हैं।

मुंबई से आए मानवाधिकार नेता फिरोज़ मिठीबोलवाला ने भारत सरकार के अमेरिका और इजराईल के साथ बढ़ते नापाक रिश्ते को भारत में बढ़ती आतंकी घटनाओं और निर्दोष मुस्लिम नौजवानों की गिरफ्तारी की वजह बताया। वहीं अयोध्या से आए महंत युगल किशोर शरण शास्त्री ने कचहरियों पर हुए कथित हमलों पर सवाल उठाते हुए कहा कि फैजाबाद कचहरी में हुआ विस्फोट भाजपा नेता विश्वनाथ सिंह और महेश पाण्डे की चौकियों पर हुए थे और वो दोनों हादसे के वक़्त गायब थे। उन्होंने कचहरी विस्फोटों में सुनवाही कर रहे न्यायाधिशों के साम्प्रदायिक रवैये का भी ज़िक्र किया। आरण्टीण्आईण् कार्यकर्ता अफ़रोज़ आलम साहिल जिन्होंने बाटला हाउस फर्जी मुठभेड़ में मारे गए युवकों के पोस्टमार्टम रिपोर्ट को निकलवाया थाए ने सूचना के अधिकार कानून पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसमें भी साम्प्रदायिक कारणों से रिपोर्टों को लटकाया जाता है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता हरमन्दिर पाण्डे ने किया। संचालन पीयूसीएल प्रदेश उपमंत्री मसीहुद्दीन संजरी ने किया। कार्यक्रम में 12 सूत्रीय प्रस्ताव भी पारित किया गया। कार्यक्रम में तारिक़ शफ़िक़ए महासागर गौतमए बलवंत यादवए अब्दुल्लाहए आफताब अहमदए सालीम दाउदीए जितेन्द्र हरि पाण्डेयए सुनीलए गुलाम अम्बियाए फहीम अहमद प्रधानए वसीउद्दीनए रवि शेखरए विजय प्रतापए शाहनवाज आलमए राजीव यादवए गुंजनए बबलीए अंशुमाला आदि मौजूद रहे। इस सम्मेलन में शमीम अख्तर संजरी की पुस्तक ष्लहू.लहूष् और तीन पुस्तकों सहित डॉक्यूमेंट्री फिल्म भगवा युद्ध का विमोचन किया गया।

द्वारा जारीरू.

मसीहुद्दीन संजरी

प्रदेश उपमंत्री पीयूसीएल

9455571488ए 9452800752

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

फासीवाद के बढ़ते कदम और न्याय की अवधारणा

राष्ट्ीय मानवाधिकार जनसम्मेलन

स्थान- संजरपुर, आजमगढ़, उत्तर प्रदेश तिथि- 27 फरवरी 2010, रविवार समय- 10 बजे से पांच बजे तक

पिछले दिनों एक के बाद एक आए न्यायालयों के फैसलों के चलते मानवाधिकार आंदोलन के सामने एक चुनौती आ गई है कि जब लोकतंत्र में न्याय पाने के एक मात्र संस्थान न्यायालय भी सत्ता के दबाव में निर्णय दे रहें हैं तो ऐसे में नागरिकों के मानवाधिकार को कैसे सुरक्षित रखा जाए। वरिष्ठ मानवाधिकार नेता और पीयूसीएल के राष्ट्ीय उपाध्यक्ष विनायक सेन को जिस तरह बिना ठोस सुबूत के रायपुर की एक अदालत ने उम्र कैद की सजा सुनाई या फिर पिछले साल पांच फरवरी 2010 को उत्तर प्रदेश की पीयूसीएल की संगठन मंत्री सीमा आजाद को माओवाद के नाम पर गिरफ्तार किया गया, उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि आम बेहैसियत लोगों को आतंकवादी या नक्सलवादी बताकर जेलों में सड़ा देना हमारे तंत्र के लिए किताना आसान होता है। हम आजमगढ़ के लोग जिन्होंने अपने कई निर्दोष बच्चों को बाटला हाउस से लेकर विभिन्न मामलों में फर्जी एनकाउंटर में कत्ल किए जाते, जेलों में सड़ाए जाते और न्याय मिलने की आस में जब न्यायलय पहुंचे अपने वकीलों को पीटे जाते देखा है और खुद इसके कहीं न सुने जाने वाले गवाह हैं। देश में मानवाधिकार रक्षा के लिए बने राष्ट्ीय मानवाधिकार आयोग की भूमिका को भी देख चुके हैं कि किस तरह उसने हमारे मासूमों जो बाटला हाउस में मारे गए पर फर्जी जांच रिपोर्ट पेश कर एनकाउंटर के नाम पर सत्ता द्वारा ठंडे दिमाग की की गई हत्या को जायज ठहराया। पोस्ट मार्टम रिपोर्ट तक को झूठे तर्कोें के आधार पर लंबे समय तक छुपाया गया। इस दहशत और आतंक के माहौल में पिछले दो सालों से हमारे दर्जनों लड़के लापता हैं और एक आशंका लगातार बनी रहती है कि अगला नंबर किसका है। इन साझा अनुभवों ने हमारे सामने स्पष्ट कर दिया है कि अब इस देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त की जा चुकी है। जिसके सबसे ज्यादा शिकार समाज के सबसे दबे-कुचले समूह और उनके सवाल उठाने वाले लोग हो रहे हैं। इस सिलसिले में सबसे अधिक दुखद न्यायालय के राजनीतिक दुरुपयोग है। जिसने देश के अंदर राज्य प्रायोजित आतंकवाद को वैधता देने के लिए यहां तक तर्क दिए हैं कि अगर फर्जी एनकाउंटरों पर न्यायिक जांच होगी तो पुलिस का मनोबल टूट जाएगा। यानी न्यायपालिका अब खुद ही भारत को एक लोकतांत्रिक देश से सैन्य राष्ट् में तब्दील करने की फासिस्ट मुहीम की अगुवाई करने लगी है। अयोध्या मुद्दे पर तथ्यों के बजाय धर्मोन्मादी आस्था के आधार पर फैसला हो या बाटला हाउस एनकाउंटर पर जांच की मांग से इसकी पुष्टि होती है कि यह फासीवाद सिर्फ चुनावी रास्ते से नहीं बल्कि कानूनी रास्ते से स्थापित किया जा रहा है। ऐसे में हम आजमगढ के लोग जिन्होंने बाटला हाउस और उसके बाद हुए विभिन्न कथित आंतकवादी वारदातों अपने लोगों और अपने शहर के प्रति सरकार, नौकरशाही और न्यायपालिका के फासीवादी व्यवहार को देखा है, आज इस निर्णय पर पहुंचे हैं कि लोकतंत्र में न्याय की पूरी अवधारणा पर ही नए सिरे से बहस जरुरी हो जाती है। इसलिए लंबे समय से राज्य प्रायोजित मानवाधिकार हनन का केंद्र बन चुके आजमगढ़ में हम पूरे देश में चल रहे मानवाधिकार हनन और उसमें न्यायपालिका के राजनीतिक इस्तेमाल पर एक राष्ट्ीय जनसम्मेलन आयोजित कर रहे हैं। इस महत्वपूर्ण आयोजन में हम आपसे शामिल हाने का आग्रह करते हैं।
संपर्क सूत्र- मसीहुद्दीन संजरी ;09455571488द्ध, शाहनवाज आलम ;09415254919द्ध, राजीव यादव ;09452800752द्ध, तारिक शफीक ;09454291958द्ध, रवि शेखर ;09369444528द्ध, विनोद यादव ;09450476417द्ध

सोमवार, 3 जनवरी 2011

मानवाधिकार दिवस पर परिचर्चा

विदेशी कंपनियों पर निर्भर मानवाधिकार

गौतम नवलखा
सचिव, पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (पीयूडीआर), नई दिल्ली
मानवाधिकार की समस्या राज्य द्वारा खड़ी की गई है। पूरे देश में न केवल मानवाधिकारों का हनन हो रहा है, बल्कि सिविल लिबर्टिज कार्यकर्ताओं के रास्ते में नई-नई मुश्किलें खड़ी की जा रही हैं। मुख्तलिफ़ इलाकों में कार्यकर्ताओं को जाने से रोका जा रहा है। कई दुर्गम इलाकों में पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों का उत्पीड़न लगातार जारी है। उन इलाकों को पूरे देश से काट दिया गया है। वहां किसी को आने-जाने नहीं दिया जा रहा है। सिविल लिबर्टिज के कार्यकर्ताओं को भी लगातार उत्पीड़ित किया जा रहा है। उन्हें माओवादी और आतंकी बताकर उन पर फर्जी मुकदमें लादे जा रहे हैं। यह सबकुछ जानबूझकर बहुराष्ट्ीय कम्पनियों को फायदा पहुंचाने के लिए किया जा रहा है। हमने पिछले दिनों देखा कि छत्तीसगढ़, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल और उड़ीसा में आदिवासियों की जमीने जबरन छीनकर बहुराष्ट्ीय कम्पनियों को दी गई। विरोध करने पर आदिवासियों को माओवादी करार देकर गोली से उड़ा दिया गया, उनके घरों को जला दिया गया। ऐसे में यह उम्मीद करना ही बेकार है कि सरकार या कोई सरकारी संस्था मानवाधिकारों की रक्षा करेगी। यह काम सिविल लिबर्टिज कार्यकर्ताओं को ही करना होगा। वैसे, भी देखें तो मानवाधिकारों के मामले में वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति दिनों-दिन खराब होती जा रही है। प्रदेशों में मानवाधिकार हनन की होड़ लगी है।
गरीबों को मानवाधिकार नहीं
प्रशांत भूषण
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और मानवाधिकार कार्यकर्ता
हिंदुस्तान में गरीब-असहाय लोगों का कभी कोई अधिकार रहा ही नहीं है। व्यवस्था को ऐसा जटिल बना दिया गया है कि अगर किसी के साथ कोई अन्याय होता भी है तो वह न्यायालय में जाने से पहले कई बार सोचेगा। गरीब आदमी इस न्यायिक व्यवस्था में घुस भी गया तो यह जरूरी नहीं कि उसे न्याय मिलेगा ही। यहां ज्यादातर जज सम्पन्न वर्गों से आते हैं। उन्हें एक गरीब या आम आदमी की समस्याएं समझ में नहीं आती। यही कारण है कि पिछले कुछ सालों में कानून की व्याख्याएं बहुत बदल गई हैं। न्याय न मिलना, मानवाधिकार हनन नही ंतो क्या है? सरकार, बहुराष्ट्ीय कम्पनियों के और पुलिस-प्रशासन, सरकार के इशारों पर गरीब आदिवासियों पर लगातार जुल्म ढाह रहे हैं। ग्रीनहंट जैसे सरकारी अभियान खुल्लम-खुल्ला मानवाधिकारों का उल्लंघन हैं। खनिज सम्पदा से भरे इलाकों को पिछड़ा रखकर वहां माओवाद को पनपने का मौका दिया जा रहा है। पुलिस और सुरक्षा बलों को मनमाने अधिकार देने के लिए नए-नए कानून बनाए जा रहे हैं। हम एक ही सरकार से यह भी उम्मीद करें कि वह हमारे मानवाधिकारों की रक्षा करेगी और वही सरकार मानवाधिकारों की हत्या करने वाले काननू बनाये यह बहुत ही हास्यास्पद बात होगी। अभी कोई भी सरकार यह दावा करने की स्थिति में नहीं है कि वो मानवाधिकारों की रक्षा करती है।

फर्जी मुठभेड़ की संस्कृति
चितरंजन सिंह,
राष्ट्ीय उपाध्यक्ष, पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टिज (पीयूसीएल)
भारत में मानवाधिकारों की स्थिति तो सरकारी संस्थाओं की ही रिपोर्ट बयान कर रही हैं। फर्जी मुठभेड़ और गिरफ्तारियां पुलिसिया कामकाज की एक संस्कृति बनती जा रही है। राष्ट्ीय अपराध ब्यूरो की रिपोर्ट बताती है कि फर्जी मुठभेड़ों के मामले में उत्तर प्रदेश अव्वल है। आतंकवाद के नाम पर पूरे देश से बड़े पैमाने पर मुस्लिम युवाओं की गिरफ्तारियां हुई। सैकड़ों लोग जेलों में बिना किसी कसूर के सड़ रहे हैं। पुलिस उन पर चार्जशीट तक नहीं दाखिल कर पाई है। माओवाद के नाम पर आदिवासियों पर जुल्म किया जा रहा है। ऐसे लोगों के लिए मानवाधिकार के कोई मायने नहीं है। देश के अधिकांश हिस्सों में यही हो रहा है। लोगों को अपनी बात कहने का अधिकार तक नहीं दिया जा रहा है। कश्मीर में पिछले दिनों विरोध प्रदर्शनों पर पुलिस फायरिंग में सैकड़ों युवा मारे गए। उत्तर-पूर्व से लेकर छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट तक ऐसा क्षेत्र बनता जा रहा है, जहां सरकारी संस्थाओं को मानवाधिकार हनन के लिए लगभग प्रोत्साहित किया जा रहा है। मानवाधिकार हनन के लिए बकायदा कानून बनाये जा रहे हैं। मानवाधिकारों की रक्षा के लिए हमें ही आगे आना होगा। सरकारी और पुलिस के जुल्मों का मुकाबला करना होगा। तभी हम मानवाधिकारों की रक्षा के संघर्ष को आगे बढ़ा सकेंगे।
राज्य जिम्मेदार
राजेन्द्र सच्चर,
पूर्व मुख्य न्यायाधीश
भारत में सभी को समान संवैधानिक अधिकार मिले हुए हैं। राज्य कई बार अपने दायरे से बाहर जाकर इन अधिकारों का हनन भी करता है। लेकिन वहीं हमें ये भी अधिकार है कि हम इसके खिलाफ़ आवाज उठा सके। अखबारों को लिखने की पूरी आजादी है। उन्हें लगता है कि किन्हीं अधिकारों का हनन हो रहा है या सरकार कुछ गलत कर रही है तो वह उस पर जनमत तैयार कर सकते हैं। जनमत के माध्यम से सरकार पर यह दबाव डाला जा सकता है कि वो मानवाधिकारों की रक्षा के लिए काम करे। यह सही है कि कश्मीर सहित कई प्रदेशों में मानवाधिकारों का हनन हो रहा है। लेकिन इसे सामान्यीकृत नहीं किया जा सकता। अलग-अलग प्रदेशों में अलग-अलग स्थितियां हैं। अगर मानवाधिकारों का हनन होता है तो लोगों को विरोध करने का भी अधिकार है। मानवाधिकार हनन के लिए पूरी तरह से राज्य जिम्मेदार हैं। मानवाधिकारों की रक्षा में अदालतों की भूमिका सीमित होती है। सरकार जो कानून बनाती है, न्यायपालिका को उसी दायरे में काम करना होता है। सरकार अगर पोटा जैसे कानून बनाएगी तो जाहिर सी बात है कि उससे मानवाधिकारों का हनन होगा। न्यायपालिका में भी अलग-अलग सोच के लोग हैं। सभी अच्छे हों यह भी अपेक्षा नहीं की जा सकती। इसलिए इस पर भी सवाल उठते हैं।

प्रदर्शन का भी अधिकार नहीं

प्रो. एस.ए.आर. गिलानी
मनवाधिकार कार्यकर्ता
भारत में लगभग सभी लोकतांत्रिक संस्थाएं खोखली हो चुकी हैं। सत्ता की प्रवृत्ति फासीवादी हो चुकी है। विरोध प्रदर्शन तक का अधिकार लोगों को नहीं दिया जा रहा है। कश्मीर में अभी 112 नौजवानों को केवल इसलिए मार दिया गया क्योंकि वह विरोध प्रदर्शनों में शामिल थे। बच्चों की गिरफ्तारियां हो रही हैं। वहां के जेल निर्दोष नौजवानों से भरी हैं। कश्मीर को दिल्ली ने हमेशा उपनिवेश की तरह सुलूक किया है। ऐसा बर्ताव तो ब्रिटिश हुकूमत ने भी नहीं किया होगा। ऐसे ही दूसरे प्रदेशों में आदिवासियों-दलितों के मामले में भी है। वहां माओवाद के नाम पर लोगों को प्रताड़ित किया जा रहा है। बहुराष्ट्ीय कम्पनियों को फायदा पहुंचाने के लिए सरकार सभी कानूनों को ताक पर रखकर समझौते कर रही है। उन्हीं के लिए सैन्य बलों का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह पूरे देश में चल रहा है। मानवाधिकारों की लड़ाई सरकारी संस्थाओं के तले नहीं लड़ी जा सकती। इसके लिए जम्हूरियत में विश्वास करने वाले लोगों को मिलकर लड़ना होगा। ऐसे आंदोलनों में निरंतरता की जरुरत है। सुफियान के मामले को लोगों ने पहले खूब जोर-शोर से उठाया। बाद में सीबीआई ने क्लीनचिट दी तो किसी ने कुछ नहीं बोला। मानवाधिकारों की लड़ाई को संगठित रूप से लड़ना होगा।

विजय प्रताप से बातचीत पर आधारित

लोकमत समाचार(नागपुर) में प्रकाशित