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गुरुवार, 3 मार्च 2011

न्यायपालिका में बढ़ते राजनैतिक हस्तक्षेप पर जताई चिंता



मिलकर लड़नी होगी मानवाधिकारों की लड़ाई , हिमांशु कुमार

मानवाधिकार जनसम्मेलन संपन्न


असीमानंद की स्वीकृति के सभी धमाकों की नए सिरे से जांच हो

संजरपुरध् आज़मगढ़ए ;27 फरवरीए2011द्ध श् आज़मगढ़ के निर्दोष मुस्लिम नौजवान ही नहीं सरकारी मशिनरी के निशाने पर छत्तीसगढ़ के ग़रीब आदिवासी भी हैं। वहां पर 650 गांवों जलाकर आदिवासियों को बेघर कर दिया गया। सैकड़ों की संख्या में लोग लापता हैं। मानवाधिकार आयोग जैसी संस्थाएं कहां हैंघ् नए हिन्दुस्तान की लड़ाई छत्तीसगढ़ के आदिवासियों और संजरपूर के निर्दोष नौजवानों को मिलकर लड़नी है।श् ये बातें वरिष्ठ मानवाधिकार नेता हिमांशु कुमार ने संजरपूर में आयोजित विशाल राष्ट्रीय मानवाधिकार जनसम्मेलन में कही।

दिल्ली से आई मानवाधिकार नेता शबनम हाशमी ने जांच एजेंसियों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि मालेगांवए समझौता एक्सप्रेसए मक्का मस्जिद में विस्फोट करने वाले असीमानंद और सुनील जोशी का योगी आदित्यनाथ के साथ गहरा संबंध उजागर हुआ हैए बावजूद इसके आजतक योगी को गिरफ्तार करना तो दूर पूछताछ तक भी नहीं की गई। पीयूसीएल के राष्ट्रीय सचिव चितरंजन सिंह ने कहा कि देश में हुए तमाम धमाकों की नए सिरे से जांच की जाए। उन्होंने संघ परिवार और उसकी फासिस्ट विचारधारा की न्यायपालिका तक में घुसपैठ पर चिंता जताते हुए न्यायपालिका में धर्मनिरपेक्ष मुल्यों की पुनर्बहाली की मांग की। लखनउ के वरिष्ठ वकील मोण् शोएब ने भाजपा के बजाए कांग्रेसए सपा और बसपा को ज़्यादा खतरनाक बताते हुए कहा कि ये पार्टियां भाजपा की दूसरे नंबर की टीम हैंए जो सेकुलर चेहरे के साथ संघ परिवार के एजेन्डे को बढ़ा रही हैं।

मुंबई से आए मानवाधिकार नेता फिरोज़ मिठीबोलवाला ने भारत सरकार के अमेरिका और इजराईल के साथ बढ़ते नापाक रिश्ते को भारत में बढ़ती आतंकी घटनाओं और निर्दोष मुस्लिम नौजवानों की गिरफ्तारी की वजह बताया। वहीं अयोध्या से आए महंत युगल किशोर शरण शास्त्री ने कचहरियों पर हुए कथित हमलों पर सवाल उठाते हुए कहा कि फैजाबाद कचहरी में हुआ विस्फोट भाजपा नेता विश्वनाथ सिंह और महेश पाण्डे की चौकियों पर हुए थे और वो दोनों हादसे के वक़्त गायब थे। उन्होंने कचहरी विस्फोटों में सुनवाही कर रहे न्यायाधिशों के साम्प्रदायिक रवैये का भी ज़िक्र किया। आरण्टीण्आईण् कार्यकर्ता अफ़रोज़ आलम साहिल जिन्होंने बाटला हाउस फर्जी मुठभेड़ में मारे गए युवकों के पोस्टमार्टम रिपोर्ट को निकलवाया थाए ने सूचना के अधिकार कानून पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसमें भी साम्प्रदायिक कारणों से रिपोर्टों को लटकाया जाता है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता हरमन्दिर पाण्डे ने किया। संचालन पीयूसीएल प्रदेश उपमंत्री मसीहुद्दीन संजरी ने किया। कार्यक्रम में 12 सूत्रीय प्रस्ताव भी पारित किया गया। कार्यक्रम में तारिक़ शफ़िक़ए महासागर गौतमए बलवंत यादवए अब्दुल्लाहए आफताब अहमदए सालीम दाउदीए जितेन्द्र हरि पाण्डेयए सुनीलए गुलाम अम्बियाए फहीम अहमद प्रधानए वसीउद्दीनए रवि शेखरए विजय प्रतापए शाहनवाज आलमए राजीव यादवए गुंजनए बबलीए अंशुमाला आदि मौजूद रहे। इस सम्मेलन में शमीम अख्तर संजरी की पुस्तक ष्लहू.लहूष् और तीन पुस्तकों सहित डॉक्यूमेंट्री फिल्म भगवा युद्ध का विमोचन किया गया।

द्वारा जारीरू.

मसीहुद्दीन संजरी

प्रदेश उपमंत्री पीयूसीएल

9455571488ए 9452800752

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

फासीवाद के बढ़ते कदम और न्याय की अवधारणा

राष्ट्ीय मानवाधिकार जनसम्मेलन

स्थान- संजरपुर, आजमगढ़, उत्तर प्रदेश तिथि- 27 फरवरी 2010, रविवार समय- 10 बजे से पांच बजे तक

पिछले दिनों एक के बाद एक आए न्यायालयों के फैसलों के चलते मानवाधिकार आंदोलन के सामने एक चुनौती आ गई है कि जब लोकतंत्र में न्याय पाने के एक मात्र संस्थान न्यायालय भी सत्ता के दबाव में निर्णय दे रहें हैं तो ऐसे में नागरिकों के मानवाधिकार को कैसे सुरक्षित रखा जाए। वरिष्ठ मानवाधिकार नेता और पीयूसीएल के राष्ट्ीय उपाध्यक्ष विनायक सेन को जिस तरह बिना ठोस सुबूत के रायपुर की एक अदालत ने उम्र कैद की सजा सुनाई या फिर पिछले साल पांच फरवरी 2010 को उत्तर प्रदेश की पीयूसीएल की संगठन मंत्री सीमा आजाद को माओवाद के नाम पर गिरफ्तार किया गया, उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि आम बेहैसियत लोगों को आतंकवादी या नक्सलवादी बताकर जेलों में सड़ा देना हमारे तंत्र के लिए किताना आसान होता है। हम आजमगढ़ के लोग जिन्होंने अपने कई निर्दोष बच्चों को बाटला हाउस से लेकर विभिन्न मामलों में फर्जी एनकाउंटर में कत्ल किए जाते, जेलों में सड़ाए जाते और न्याय मिलने की आस में जब न्यायलय पहुंचे अपने वकीलों को पीटे जाते देखा है और खुद इसके कहीं न सुने जाने वाले गवाह हैं। देश में मानवाधिकार रक्षा के लिए बने राष्ट्ीय मानवाधिकार आयोग की भूमिका को भी देख चुके हैं कि किस तरह उसने हमारे मासूमों जो बाटला हाउस में मारे गए पर फर्जी जांच रिपोर्ट पेश कर एनकाउंटर के नाम पर सत्ता द्वारा ठंडे दिमाग की की गई हत्या को जायज ठहराया। पोस्ट मार्टम रिपोर्ट तक को झूठे तर्कोें के आधार पर लंबे समय तक छुपाया गया। इस दहशत और आतंक के माहौल में पिछले दो सालों से हमारे दर्जनों लड़के लापता हैं और एक आशंका लगातार बनी रहती है कि अगला नंबर किसका है। इन साझा अनुभवों ने हमारे सामने स्पष्ट कर दिया है कि अब इस देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त की जा चुकी है। जिसके सबसे ज्यादा शिकार समाज के सबसे दबे-कुचले समूह और उनके सवाल उठाने वाले लोग हो रहे हैं। इस सिलसिले में सबसे अधिक दुखद न्यायालय के राजनीतिक दुरुपयोग है। जिसने देश के अंदर राज्य प्रायोजित आतंकवाद को वैधता देने के लिए यहां तक तर्क दिए हैं कि अगर फर्जी एनकाउंटरों पर न्यायिक जांच होगी तो पुलिस का मनोबल टूट जाएगा। यानी न्यायपालिका अब खुद ही भारत को एक लोकतांत्रिक देश से सैन्य राष्ट् में तब्दील करने की फासिस्ट मुहीम की अगुवाई करने लगी है। अयोध्या मुद्दे पर तथ्यों के बजाय धर्मोन्मादी आस्था के आधार पर फैसला हो या बाटला हाउस एनकाउंटर पर जांच की मांग से इसकी पुष्टि होती है कि यह फासीवाद सिर्फ चुनावी रास्ते से नहीं बल्कि कानूनी रास्ते से स्थापित किया जा रहा है। ऐसे में हम आजमगढ के लोग जिन्होंने बाटला हाउस और उसके बाद हुए विभिन्न कथित आंतकवादी वारदातों अपने लोगों और अपने शहर के प्रति सरकार, नौकरशाही और न्यायपालिका के फासीवादी व्यवहार को देखा है, आज इस निर्णय पर पहुंचे हैं कि लोकतंत्र में न्याय की पूरी अवधारणा पर ही नए सिरे से बहस जरुरी हो जाती है। इसलिए लंबे समय से राज्य प्रायोजित मानवाधिकार हनन का केंद्र बन चुके आजमगढ़ में हम पूरे देश में चल रहे मानवाधिकार हनन और उसमें न्यायपालिका के राजनीतिक इस्तेमाल पर एक राष्ट्ीय जनसम्मेलन आयोजित कर रहे हैं। इस महत्वपूर्ण आयोजन में हम आपसे शामिल हाने का आग्रह करते हैं।
संपर्क सूत्र- मसीहुद्दीन संजरी ;09455571488द्ध, शाहनवाज आलम ;09415254919द्ध, राजीव यादव ;09452800752द्ध, तारिक शफीक ;09454291958द्ध, रवि शेखर ;09369444528द्ध, विनोद यादव ;09450476417द्ध

सोमवार, 3 जनवरी 2011

मानवाधिकार दिवस पर परिचर्चा

विदेशी कंपनियों पर निर्भर मानवाधिकार

गौतम नवलखा
सचिव, पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (पीयूडीआर), नई दिल्ली
मानवाधिकार की समस्या राज्य द्वारा खड़ी की गई है। पूरे देश में न केवल मानवाधिकारों का हनन हो रहा है, बल्कि सिविल लिबर्टिज कार्यकर्ताओं के रास्ते में नई-नई मुश्किलें खड़ी की जा रही हैं। मुख्तलिफ़ इलाकों में कार्यकर्ताओं को जाने से रोका जा रहा है। कई दुर्गम इलाकों में पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों का उत्पीड़न लगातार जारी है। उन इलाकों को पूरे देश से काट दिया गया है। वहां किसी को आने-जाने नहीं दिया जा रहा है। सिविल लिबर्टिज के कार्यकर्ताओं को भी लगातार उत्पीड़ित किया जा रहा है। उन्हें माओवादी और आतंकी बताकर उन पर फर्जी मुकदमें लादे जा रहे हैं। यह सबकुछ जानबूझकर बहुराष्ट्ीय कम्पनियों को फायदा पहुंचाने के लिए किया जा रहा है। हमने पिछले दिनों देखा कि छत्तीसगढ़, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल और उड़ीसा में आदिवासियों की जमीने जबरन छीनकर बहुराष्ट्ीय कम्पनियों को दी गई। विरोध करने पर आदिवासियों को माओवादी करार देकर गोली से उड़ा दिया गया, उनके घरों को जला दिया गया। ऐसे में यह उम्मीद करना ही बेकार है कि सरकार या कोई सरकारी संस्था मानवाधिकारों की रक्षा करेगी। यह काम सिविल लिबर्टिज कार्यकर्ताओं को ही करना होगा। वैसे, भी देखें तो मानवाधिकारों के मामले में वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति दिनों-दिन खराब होती जा रही है। प्रदेशों में मानवाधिकार हनन की होड़ लगी है।
गरीबों को मानवाधिकार नहीं
प्रशांत भूषण
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और मानवाधिकार कार्यकर्ता
हिंदुस्तान में गरीब-असहाय लोगों का कभी कोई अधिकार रहा ही नहीं है। व्यवस्था को ऐसा जटिल बना दिया गया है कि अगर किसी के साथ कोई अन्याय होता भी है तो वह न्यायालय में जाने से पहले कई बार सोचेगा। गरीब आदमी इस न्यायिक व्यवस्था में घुस भी गया तो यह जरूरी नहीं कि उसे न्याय मिलेगा ही। यहां ज्यादातर जज सम्पन्न वर्गों से आते हैं। उन्हें एक गरीब या आम आदमी की समस्याएं समझ में नहीं आती। यही कारण है कि पिछले कुछ सालों में कानून की व्याख्याएं बहुत बदल गई हैं। न्याय न मिलना, मानवाधिकार हनन नही ंतो क्या है? सरकार, बहुराष्ट्ीय कम्पनियों के और पुलिस-प्रशासन, सरकार के इशारों पर गरीब आदिवासियों पर लगातार जुल्म ढाह रहे हैं। ग्रीनहंट जैसे सरकारी अभियान खुल्लम-खुल्ला मानवाधिकारों का उल्लंघन हैं। खनिज सम्पदा से भरे इलाकों को पिछड़ा रखकर वहां माओवाद को पनपने का मौका दिया जा रहा है। पुलिस और सुरक्षा बलों को मनमाने अधिकार देने के लिए नए-नए कानून बनाए जा रहे हैं। हम एक ही सरकार से यह भी उम्मीद करें कि वह हमारे मानवाधिकारों की रक्षा करेगी और वही सरकार मानवाधिकारों की हत्या करने वाले काननू बनाये यह बहुत ही हास्यास्पद बात होगी। अभी कोई भी सरकार यह दावा करने की स्थिति में नहीं है कि वो मानवाधिकारों की रक्षा करती है।

फर्जी मुठभेड़ की संस्कृति
चितरंजन सिंह,
राष्ट्ीय उपाध्यक्ष, पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टिज (पीयूसीएल)
भारत में मानवाधिकारों की स्थिति तो सरकारी संस्थाओं की ही रिपोर्ट बयान कर रही हैं। फर्जी मुठभेड़ और गिरफ्तारियां पुलिसिया कामकाज की एक संस्कृति बनती जा रही है। राष्ट्ीय अपराध ब्यूरो की रिपोर्ट बताती है कि फर्जी मुठभेड़ों के मामले में उत्तर प्रदेश अव्वल है। आतंकवाद के नाम पर पूरे देश से बड़े पैमाने पर मुस्लिम युवाओं की गिरफ्तारियां हुई। सैकड़ों लोग जेलों में बिना किसी कसूर के सड़ रहे हैं। पुलिस उन पर चार्जशीट तक नहीं दाखिल कर पाई है। माओवाद के नाम पर आदिवासियों पर जुल्म किया जा रहा है। ऐसे लोगों के लिए मानवाधिकार के कोई मायने नहीं है। देश के अधिकांश हिस्सों में यही हो रहा है। लोगों को अपनी बात कहने का अधिकार तक नहीं दिया जा रहा है। कश्मीर में पिछले दिनों विरोध प्रदर्शनों पर पुलिस फायरिंग में सैकड़ों युवा मारे गए। उत्तर-पूर्व से लेकर छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट तक ऐसा क्षेत्र बनता जा रहा है, जहां सरकारी संस्थाओं को मानवाधिकार हनन के लिए लगभग प्रोत्साहित किया जा रहा है। मानवाधिकार हनन के लिए बकायदा कानून बनाये जा रहे हैं। मानवाधिकारों की रक्षा के लिए हमें ही आगे आना होगा। सरकारी और पुलिस के जुल्मों का मुकाबला करना होगा। तभी हम मानवाधिकारों की रक्षा के संघर्ष को आगे बढ़ा सकेंगे।
राज्य जिम्मेदार
राजेन्द्र सच्चर,
पूर्व मुख्य न्यायाधीश
भारत में सभी को समान संवैधानिक अधिकार मिले हुए हैं। राज्य कई बार अपने दायरे से बाहर जाकर इन अधिकारों का हनन भी करता है। लेकिन वहीं हमें ये भी अधिकार है कि हम इसके खिलाफ़ आवाज उठा सके। अखबारों को लिखने की पूरी आजादी है। उन्हें लगता है कि किन्हीं अधिकारों का हनन हो रहा है या सरकार कुछ गलत कर रही है तो वह उस पर जनमत तैयार कर सकते हैं। जनमत के माध्यम से सरकार पर यह दबाव डाला जा सकता है कि वो मानवाधिकारों की रक्षा के लिए काम करे। यह सही है कि कश्मीर सहित कई प्रदेशों में मानवाधिकारों का हनन हो रहा है। लेकिन इसे सामान्यीकृत नहीं किया जा सकता। अलग-अलग प्रदेशों में अलग-अलग स्थितियां हैं। अगर मानवाधिकारों का हनन होता है तो लोगों को विरोध करने का भी अधिकार है। मानवाधिकार हनन के लिए पूरी तरह से राज्य जिम्मेदार हैं। मानवाधिकारों की रक्षा में अदालतों की भूमिका सीमित होती है। सरकार जो कानून बनाती है, न्यायपालिका को उसी दायरे में काम करना होता है। सरकार अगर पोटा जैसे कानून बनाएगी तो जाहिर सी बात है कि उससे मानवाधिकारों का हनन होगा। न्यायपालिका में भी अलग-अलग सोच के लोग हैं। सभी अच्छे हों यह भी अपेक्षा नहीं की जा सकती। इसलिए इस पर भी सवाल उठते हैं।

प्रदर्शन का भी अधिकार नहीं

प्रो. एस.ए.आर. गिलानी
मनवाधिकार कार्यकर्ता
भारत में लगभग सभी लोकतांत्रिक संस्थाएं खोखली हो चुकी हैं। सत्ता की प्रवृत्ति फासीवादी हो चुकी है। विरोध प्रदर्शन तक का अधिकार लोगों को नहीं दिया जा रहा है। कश्मीर में अभी 112 नौजवानों को केवल इसलिए मार दिया गया क्योंकि वह विरोध प्रदर्शनों में शामिल थे। बच्चों की गिरफ्तारियां हो रही हैं। वहां के जेल निर्दोष नौजवानों से भरी हैं। कश्मीर को दिल्ली ने हमेशा उपनिवेश की तरह सुलूक किया है। ऐसा बर्ताव तो ब्रिटिश हुकूमत ने भी नहीं किया होगा। ऐसे ही दूसरे प्रदेशों में आदिवासियों-दलितों के मामले में भी है। वहां माओवाद के नाम पर लोगों को प्रताड़ित किया जा रहा है। बहुराष्ट्ीय कम्पनियों को फायदा पहुंचाने के लिए सरकार सभी कानूनों को ताक पर रखकर समझौते कर रही है। उन्हीं के लिए सैन्य बलों का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह पूरे देश में चल रहा है। मानवाधिकारों की लड़ाई सरकारी संस्थाओं के तले नहीं लड़ी जा सकती। इसके लिए जम्हूरियत में विश्वास करने वाले लोगों को मिलकर लड़ना होगा। ऐसे आंदोलनों में निरंतरता की जरुरत है। सुफियान के मामले को लोगों ने पहले खूब जोर-शोर से उठाया। बाद में सीबीआई ने क्लीनचिट दी तो किसी ने कुछ नहीं बोला। मानवाधिकारों की लड़ाई को संगठित रूप से लड़ना होगा।

विजय प्रताप से बातचीत पर आधारित

लोकमत समाचार(नागपुर) में प्रकाशित